Success Mantra – यश मंत्र

Jyotish jagat

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नमस्कार,
आमच्या या वेब साईट वर ” Yash Mantra (यश मंत्र)” हे सदर आम्ही सुरु करीत आहोत. यामध्ये आम्ही जीवनात यशस्वी कसे बनावे, श्रीमंत कसे बनावे, नेतृत्व गुण विकसित करुन यशस्वी नेता अगर प्रशासक कसे बनावे यासंबंधात काही मुलभूत पण महत्वच्या विषयांवर लेख माला सुरु करणार आहोत.
इथे श्रीमंती याचा अर्थ केवळ पैसा कमावणे इतकेच नाही तर आरोग्य, नातेसंबंध (वैयक्तिक व सामाजीक) व अर्थिक या तिनही स्तरावर सशक्त व समाधान स्थितीत असणे होय. एखाद्याकडे भरपुर संपत्ती आहे पण आरोग्य चांगले नसेल तर ती व्यक्ती त्या संपत्तीचा उपभोग घेण्यास असमर्थ ठरते हीच गोष्ट नातेसंबंध नीट नसतील तरीही होते.
आमच्या या लेख मालेतून शारिरीक व मानसिक आरोग्य कसे प्राप्त करावे, वैयक्तीक व सामाजीक नातेसंबंध उत्तम कसे बनवावे, नेतृत्व गुण कसे विकसित करावे, अर्थिक स्थिती कशी मजबूत बनवावी, विचार करण्याची दिशा काय व कशी असावी, या संबंधात विचार मांडणार आहोत. आमच्या या लेख मालेचा जर कोणा एकालाही जरासा जरी फायदा झाला तरी आम्ही आमचा उद्येश यशस्वी झाला असे समजू शकतो.

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टिम- ज्योतिष जगत.

गणेश- एक कुशल प्रशासक

          हिन्दू संस्कृति के अनुसार मानव का शरीर पांच तत्त्वों से निर्मित है और इन तत्त्वों के पाँच अधिदेव माने गए हैं-आकाश तत्त्व के शिव देवता, जल तत्व के लिए श्री विष्णू, वायु तत्त्व के भगवती(देवी) देवता, अग्नि के सूर्य देव और पृथ्वी तत्त्व के श्री गणेश देवता हैं। इसी को हम पंचायतन कहते है।  गणेश जी की विचित्र आकृति के आध्यात्मिक संकेतों के रहस्य को यदि भौतिक जगत के समरूप रख कर समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट होगा कि सनातन लाभ प्राप्त करने के लिए गणेश अर्थात् शिव पुत्र अर्थात शिवत्व प्राप्त करना होगा अन्यथा क्षेम एवं लाभ (भगवान गणेश के दो पुत्र) की कामना सफल नहीं होगी। गजानन गणेश की व्याख्या करें तो ज्ञात होगा कि ‘गज’ दो व्यंजनों से बना है। ‘ज’ जन्म अथवा उद्गम का प्रतीक है तो ‘ग’ प्रतीक है गति और गंतव्य का। अर्थात् गज शब्द उत्पत्ति और अंत का संकेत देता है-जहाँ से आये हो वहीं जाओगे। जो जन्म है वही मृत्यु भी है। ब्रह्म और जगत के यथार्थ को बनाने वाला ही गजानन गणेश है।

गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है।

संत ज्ञानेश्वर कहते है –

“अ”कार  चरणयुगुल ! “उ”कार उदार विशाल ! “म”कार महामंडल ! मस्तकाकारे !!

हे तिन्ही एकवटले तेथ शब्दब्रम्ह  कवळले ! ते मियां श्रीगुरु कृपा नमिलें ! आदिबीज !!

 

Jyotsh jagat

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गणेश मे एक शासक या नेता के गुण  –

गणेश जी को यदि गणपति अर्थात किसी राज्य का राजा मान कर विश्लेषण किया जाए तो किसी शासक के अच्छे लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगेंगे। गणेश जी गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं। वे विवेकशील हैं। उनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र है। हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है। हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आँखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। शासक भी वही सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके। आंखों के माध्यम से मन के भावों को समझना सुगम होता है। यदि शासक की आँखें छोटी होंगी तो उसके भावों को जान पाना उतना ही कठिन होगा। इस प्रकार अच्छा शासक वही होता है जो दूसरों के मन को तो अच्छी तरह से पढ़ ले परन्तु उसके मन को कोई न समझ सके।

गज मुख पर कान भी इस बात के प्रतीक हैं कि शासक जनता की बात को सुनने के लिए कान सदैव खुले रखें। यदि शासक जनता की ओर से अपने कान बंद कर लेगा तो वह कभी सफल नहीं हो सकेगा। शासक को हाथी की ही भांति शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी होना चाहिए अपने एवं परिवार के पोषण के लिए शासक को न तो किसी पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसकी आय के स्रोत ज्ञात होने चाहिए। हाथी बिना झुके ही अपनी सूँड की सहायता से सब कुछ उठा कर अपना पोषण कर सकता है। शासक को किसी भी परिस्थिति में दूसरों के सामने झुकना नहीं चाहिए। गणेश जी को शुद्ध घी, गुड और गेहूँ के लड्डू बहुत प्रिय हैं। इसीलिए उन्हें मोदक प्रिय कहा जाता है। ये तीनों चीज़ें सात्विक एवं स्निग्ध हैं अर्थात उत्तम आहार हैं। सात्विक आहार बुद्धि में स्थिरता लाता है। उनका उदर बहुत लम्बा है। उसमें हर बात समा जाती है। शासक में हर बात का रहस्य बनाए रखने की क्षमता होनी चाहिए।

गणेश जी सात्विक देवता हैं उनके पैर छोटे हैं जो कर्मेन्द्रिय के सूचक हैं। पैर जो गुण के प्रतीक हैं जो शरीर के ऊपरी भाग, जो सत्व गुणों का प्रतीक है, के अधीन रहने चाहिए। चूहा उनका वाहन है। चूहा बहुत चंचल और बिना बात हानि करने वाला है। चूहा किसी बात की परवाह किए बिना किसी भी वस्तु को काट कर नष्ट कर सकता है। इसी प्रकार कुतर्क बुद्धि भी मन के सात्विक भाव को खंडित करने का प्रयास करती है। यह मानव के राग-द्वेष आदि मानसिक गुणों से भरे मन का प्रतीक है। चूहे जैसे चंचल मन पर बुद्दि की भारी शिला रखनी आवश्यक है। वश में रह कर ही अमंगलकारी तत्त्व को मंगलमय वाहन अथवा साधन बनाया जा सकता है।

गणेश जी की चार भुजाएँ चार प्रकार के भक्तों, चार प्रकार की सृष्टि, और चार पुरुषार्थों का ज्ञान कराती है। हाथों में धारण अस्त्रों में पाश राग का; अंकुश क्रोध का संकेत है। वरदहस्त कामनाओं की पूर्ति तथा अभय हस्त सम्पूर्ण सुरक्षा का सूचक है। उनके सूप-कर्ण होने का अर्थ कि वह अज्ञान की अवांछित धूल को उड़ाकर उन्हें ज्ञान दान देते हैं। माया को हटाकर ब्रह्म का साक्षात्कार कराते हैं। नाग का यज्ञोपवीत कुंडलिनी का संकेत है। शीश पर धारण चन्द्रमा अमृत का प्रतीक है। फिर भी गणेश चतुर्थी को चन्द्रमा के दर्शन करना वर्जित कहा गया है। इस संदर्भ में एक पौराणिक आख्यान इस प्रकार है कि-एक बार गणेश जी अपने मूषक पर सवार होकर ब्रह्मलोक से चन्द्र-लोक होते हुए मर्त्यलोक आ रहे थे। उनके स्थूलकाय शरीर, गजमुख, मूषक वाहन इत्यादि की विचित्रताओं को देख कर चन्द्रमा हंस पड़े। उस हँसी के कारण गणेश जी क्रोधित हो उठे और उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दिया कि गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले को कलंक लगेगा। इसी कारण स्वयं भगवान श्री कृष्ण पर मणि चुराने का कलंक लगा था।

गणेश जी को प्रथम लिपिकार माना जाता है उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेद व्यास जी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था। जैन एवं बौद्ध धर्मों में भी गणेश पूजा का विधान है। गणेश को हिन्दू संस्कृति में आदि देव भी माना गया है। अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुख, भय, चिन्ता इत्यादि विघ्न के हरणकर्ता के रूप में पूजित होकर मानवों का संताप हरते रहे हैं। वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए गणेश जी की पूजा और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साह पूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है ।

  • ज्योतिष जगत

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ग्रह बलम्‌ –

Uttam Gawade

श्री उत्तम गावडे
ज्यो. विशारद, वास्तु विशारद
9901287974

ग्रहांचे बलाबल- पत्रिकेचा अभ्यास करतांना प्रत्येक ग्रह केंव्हा बलवान असतो व केंव्हा बलहीन असतो हे पाहणे गरजेचे असते. षड्बल, विंशोपिका बल अथवा अष्टकवर्गावरून ग्रहांचे बल पाहता येते. हे पाहण्यासाठी ग्रह गणिताचा चांगला अभ्यास असावा लागतो. या बलांव्यतिरिक्त अजूनही काही गोष्टी सांगितल्या आहेत ज्यावरून ग्रह बलवान आहे की बलहीन हे फारशा गणिताशिवायही चटकन लक्षात येते पण अशा तऱ्हेच्या अगदिच मुलभूत (बेसिक) पण महत्वाच्या गोष्टी नेहमीच दुर्लक्षीत राहील्या आहेत खास करुन सेल्फ स्टडि नामक अभ्यासकांमुळे. चांगल्या गुरूकडुन अगर चांगल्या संस्थेमार्फत शिक्षण घेतांना या अडचणी येत नाहीत असा माझा तरी अनुभव आहे.

पत्रिकेत कोणता ग्रह केंव्हा बलवान असतो याबद्यल थोडी मुलभूत माहीती पुढे देत आहे.

१) रवि- रवी स्वराशी (सिंह), मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, आपल्या होऱ्यात, रविवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, उत्तरायणात, मध्यान्ह काळी, राशीप्रवेशाच्या (संक्रांत) वेळी, मित्र व स्व वर्गामध्ये, दशमभावात नेहमी बली असतो. राशीच्या पहिल्या भागात (१ ते १० अंशात) संपूर्ण बली, मध्य भागात मध्यमबली व शेवटच्या भागात बलहीन असतो.

२) चंद्र – चंद्र स्वराशी (कर्क), मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, आपल्या होऱ्यात, सोमवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये चतुर्थ स्थानात, शुभग्रहांनी दृष्ट असताना, उत्तरायनात, (काहींच्या मते दक्षिणायनात सुध्दा), भावसंधीवर नसताना, शुक्ल द्वितियेपासून शुक्ल दशमी पर्यंत मध्यम बली, कृष्ण षष्टी पासून शुक्ल प्रतिपदेपर्यंत बलहीन व शुक्ल एकादशी पसून कृष्ण पंचमी पर्यंत पूर्णबली समजावा. राशीच्या शेवटी (२१ ते ३० अंश)संपूर्ण बली, सुरवातीला बलहीन व मध्ये मध्यमबली असतो.

३) मंगळ – मंगळ स्वराशी, मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, मंगळवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये, दक्षिणायनात, रात्री, वक्री असतांना, राशीच्या सुरुवातीला, दशम भावात मंगळ बली समजावा. राशीच्या पहिल्या भागात (१ ते १० अंशात) संपूर्ण बली, मध्य भागात बलहीम व शेवटच्या भागात मध्यमबली असतो.

४) बुध – बुध स्वराशी, मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, धनु राशीत सूर्याबरोबर नसेल तर, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, बुधवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये, दिवस-रात्र, उत्तरायनात, राशिच्या मध्ये, लग्न स्थानी नेहमी बली समजावा. राशीच्या पहिल्या भागात मध्यम बली, मध्य भागात (११ ते २० अंश) संपूर्ण बली व राशीच्या शेवटच्या भागात बलहीन असतो.

५) गुरु – गुरु स्वराशी, मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, गुरुवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये, उत्तरायनात, जलराशीत, ग्रहयुद्धात विजयी असताना, राशिच्या मधला द्रेष्कानात, प्रथम, चतुर्थ व दशम भावात (निचेचा असला तरी, सुर्याच्या पुढच्या अंशात, सुर्याच्या पुढच्या राशीत बलवान असतो. राशीच्या पहिल्या भागात मध्यम बली, मध्य भागात (११ ते २० अंश) संपूर्ण बली व राशीच्या शेवटच्या भागात बलहीन असतो.

६) शुक्र – शुक्र स्वराशी, मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, शुक्रवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये, राशीच्या मधल्या भागात, अपराण्ह काळी(मध्यान्ह नंतर व संध्याकाळ पुर्वी), ३,४,६,१२ स्थानी, ग्रह युध्दात, चंद्राबरोबर असताना, वक्रि असताना, सुर्याच्या पुढच्या अंशात, सुर्याच्या पुढच्या राशीत बलवान असतो. राशीच्या पहिल्या भागात बलहीन, मध्य भागात (११ ते २० अंश) संपूर्ण बली व राशीच्या शेवटच्या भागात मध्यमबली असतो.

७) शनि – शनि स्वराशी, मूलत्रिकोण, उच्च राशीत, स्व:ताच्या द्रेष्काणात, शनिवारी, आपल्या नवमांशात, उच्चादि नवमांशात, मित्र व स्व वर्गामध्ये, सप्तम भावात, दक्षिणायनात, राशीच्या शेवटच्या भागात, आपल्या दशेत, कृष्णपक्षात, रात्रीच्या वेळी, वक्री असताना बलवान समजावा. राशीच्या शेवटी (२१ ते ३० अंश)संपूर्ण बली, सुरवातीला बलहीन व मध्ये मध्यमबली असतो.

८) राहु – राहु १,२,४,८,११ राशीचा असेल तर बलवान असतो, सूर्य व चंद्रा सोबत असतानांही राहु बलवान समजावा.

९) केतू – केतू धनु राशीच्या उत्तरार्धात, ६,१२,८ राशिचा असेल तर बलवान असतो. केतू राशीच्या सुरवातीला बलवान समजावा.
*संदर्भ- होरासार:, जातक पारिजात,
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हिंदी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। – ग्रह बलनिरुपण

पद्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान

जलस्रोतों में “कुंड” एक विशेष प्रकार की रचना है तो उसमें भी एक निर्माण शैली है पद्मकुंड की। इसे कमल कुंड भी कहा जाता है। इसे कमलखेत के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पद्म उत्पन्न करता है।

Jyotish Jagat

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पुष्करिणी, दीर्घिका, पोखरी, पोखरणी वगैरह भी इसके पर्याय हैं। हालांकि अपराजित, राजवल्लभ आदि शिल्प ग्रंथों में अनेक प्रकार के कुंडों का नामवार विवरण मिल जाता है और पुराणों में मत्स्य और सांबपुराण में इनका सुंदर विवरण है। इससे यह तो लगता ही है –

  1. ये कुंड कृत्रिम बनाए जाते थे,
    2. कुंडों की रचना पाषाणों से होती है,
    3. पुष्पादि रूप में उनका संयोजन होता
    4. कोणादि रूपों को भी दिखाया जाता।

भारतीय परंपरा में स्नान और देवालयों में स्नात्र आदि विधानों के लिए बड़े-बड़े कुंड उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए गए हैं। कई नाम, कई रूप और उनके निर्माण की भी अपनी अपनी कहानियां और इतिहास है।

श्रीलंका तक कुंडों का वैभव देखा जा सकता है। वहां राजधानी के पास ही पोलेण्णरुव्वा के जेतवनराम परिसर में एक सुंदर कुंड है : पद्मपोखरी ( Lotus pond) यह करीब आठ सौ साल पुराना है। राजा पराक्रमबाहू (1153-86 ई.) के शासनकाल में इसका निर्माण हुआ। इसके प्रारंभिक अवशेष जेतवन की खुदाई में मिले।

इसकी रचना पद्म के आकार की है और नज़र ऐसे आता है जैसे भूमिस्थ कमलाकार मंच हो जबकि यह बहुत पवित्र जलस्रोत रहा है। महावंश के उद्योग-निर्देश के मुताबिक इसका निर्माण हुआ। यह जानकर रोचक लगेगा यह पद्मकुंड अष्टकोण की रचना से बना हुआ है।

भूमितल से नीचे तक पांच प्रस्तर की तहें हैं और पुष्प के रूप में कुछ इस तरह गड़े हुए पत्थरों का संयोजन किया गया है वे मुकुलित पंखड़ियों से लेकर आंतरिक रूप तक को दिखाई दे।
इसकी रचना का नियम है :
360 ÷ 8 = 45°
इस तरह पांचों स्तर के पाषाणों को 45-45 डिग्री में सुघड़ बनाकर ऊपर से नीचे तक न्यून करते हुए संयोजित किया गया है। इससे यह वृताकार भी है और उसमें पंखुडी-पंखुड़ी पद्म प्रदर्शित करती है। दरअसल ये सीढ़ियां भी सिद्ध होती है। अंदर ही मोखी रूप में जलभरण और निकास रूप में जल निकालने का उपाय भी प्राचीन स्नानागार की तरह दिखाई देता है।

है न जलस्रोतों का अपना रचना विधान ! आपके आसपास भी तो कुछ ऐसा जल कौतुक होगा, बताइयेगा। आदरणीय Yogendra Pratap Singhh जी का आभार कि चित्र भेजकर इस स्थापत्य को विश्लेषित करने का अवसर सुलभ करवाया।….

© डॉ. श्रीकृष्ण  “जुगनू”

अपराध – सेवापराध

मंदिरात जाताना, देवदर्शन घेताना आपला व्यवहार कसा असावा, आपण कसे वागावे याविषयी आपल्या शास्त्रात बरेच निर्देश देण्यात आले आहेत. पद्मपुराणात बत्तीस (३२) सेवापराध सांगितले आहेत. मंदिरात अथवा देवदर्शन घेताना काय करु नये हे यात सांगितले आहे. या ३२ गोष्टी केल्याने देवदर्शनाचे पुण्य तर मिळत नाही पण उलट अपराध केल्याचा दोष मात्र लागतो, म्हणून धर्मिक वृत्तीच्या प्रत्येकांने मंदिरात जाताना अथवा देवदर्शन घेताना या ३२ गोष्टी टाळाव्यात.

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१ – मंदिरात वाहन (चप्पल बूट ई) घालून जाणे अथवा वाहनावर बसून जाणे.
२ – देवांसंबंधीत उत्सव साजरे न करणे अथवा उत्सवात सामिल न होणे.
३ – देवासमोर जाऊन देवाला नमस्कार न करणे.
४ – अशुद्ध किंवा अपवित्र अवस्थेत देवदर्शन घेणे.
५ – देवाला एका हाताने नमस्कार करणे.
६ – (*प्रदक्षणेला जागा असताना) देवासमोरच एका जागीच प्रदक्षणा करणे.
७ – देवासमोर पाय पसरुन बसणे.
८ – देवासमोर खाटेवर अथवा पलंगावर बसणे.
९ – देवासमोर झोपणे.
१० – देवासमोर जेवण करणे.
११ – देवासमोर खोटे बोलणे. (इतर वेळीही खोटे बोलणे हे टाळावेच).
१२ – देवासमोर जोरात, मोठ्या आवाजात बोलणे.
१३ – देवासमोर परस्पर गप्प मारणे.
१४ – देवासमोर रडणे, अश्रू ढाळाणे.
१५ – देवासमोर इतरांशी भांडणे.
१६ – देवासमोर इतरांना शिक्षा देणे, अथवा शासन करणे.
१७ – देवासमोर दुसऱ्यांवर अनुग्रह (दया, कृपा) करणे.
१८ – देवासमोर स्त्रियांवर रागावणे अथवा स्त्रियांप्रती वाईट बोलणे.
१९ – देवासमोर अंगावर कंबल अथवा चादर ओढून घेणे.
२० – देवासमोर दुसऱ्यांची निंदा करणे.
२१ – देवासमोर दुसऱ्यांची स्तुती करणे.
२२ – देवासमोर अपशब्द बोलणे.
२३ – देवासमोर अधोवायुचा त्याग करणे.
२४ – ऐपत असतानाही गौण उपचारांनी देवाची पुजा करणे.
२५ – देवाला नैवेद्य (भोग लावणे) दाखविल्याशिवाय खाणे.
२६ – नविन ऋतूतील येणारे फळ (सिजनल फळ) देवाला अर्पण केल्याशिवाय खाणे.
२७ – वापरलेले अथवा वापर करून उरलेल्यातील वस्तू देवाला अर्पण करणे.
२८ – देवाकडे पाठ करुन बसणे.
२९ – देवासमोर दुसऱ्यांना नमस्कार करणे.
३० – गुरुंचा अनादर करणे, गुरुंची स्तुती न करणे.
३१ – स्वत:च स्वत:ची स्तुती करणे.
३२ – कोणत्याही देवांची निंदा करणे.

वरवर पाहता या गोष्टी केवळ एक प्रकारचा निर्देश आहेत असे वाटतात पण नीट समजून घेतल्या, जरा विचार केला तर लक्षात येते की या मागे शास्त्रकारांना काय सांगायचे आहे. मंदिरात जाताना आपली मानसिक व शारिरीक स्थिती कशी असावी याविषयी यातून मार्गदर्शन मिळते. क्रोधीत अथवा खिन्न मनस्थितीत, घाई गडबडीत मंदिरात जाऊ नये. निवांत, प्रसन्न व उल्लासित मन असताना देवदर्शनासाठी मंदिरात जावे असे यातून लक्षात येते.
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इति शुभं भवतु !


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श्री उत्तम गावडे
ज्योतिष विशारद, वास्तु विशारद.
बेळगाव -कर्नाटक -महाराष्ट्र
9901287974