ग्रह बलनिरुपण

                    कुंडली में ग्रहोंका बल जाननेके अनेक प्रकार या विधा बताए गए है। अष्टकवर्ग, विंशोपिका बल, वर्ग बल इ. प्रकार से ग्रहोंके बल जाने जा सकते है।  इन सभी प्रकारके बल जाननेके लिए ज्योतिष  गणित का अच्छा अभ्यास होना जरुरी है। इन तरिकोंके आलावा भी ज्योतिष शास्त्र में ग्रहोंके बल जाननेके कुछ सरल नियम बताए गए  है।  ये नियम मूलभूत, मौलिक और महत्वपूर्ण है। इन नियमोंके जरिए बिना ज्यादा गणित किए काफी सरलतासे ये जान सकते है की, कोनसा ग्रह कब बलवान होता है और कब बलहीन होता है। यँहा पर ये स्पष्ट कर दू की, ग्रह बलवान या बलहीन होना अलग बात है और ग्रह शुभ या अशुभ होना अलग बात है। इस लेख में ग्रहोंके बल पर विचार किया गया है , शुभाशुभत्व पर नहीं। निचे दिए गए नियम पृथुयश विरचित “होरसार” ग्रंथ से लिए गए है।

          सूर्य- 

                      उत्तरायण में, अपनी राशि, नवांश, द्रेष्काण तथा होरा आदि में बलवान होता है। सूर्य दिवा बली मित्र राशि में होने के कारण मध्यम बली हो जाता है । सूर्य रविवार को और अपनी उच्च राशि में होने पर भी बलवान होता है । राशि के उदय में पूर्ण बली, मध्यम अंश में मध्यम मध्यम बली और अन्तिम अंशों पर होने से सूर्य बलहीन हो जाता है । सूर्य अपनी गति एवम्‌ अंशानुसार बलहीन तथा अस्त भी होता है।

           चम्द्रमा-

                        वृष राशि में होने पर बलवान होता है । चन्द्रमा दक्षिणायन में, अपनी राशि में होने पर, अपने होरा, द्रेष्काण और सोमवार को भी चन्द्रमा बलवान होता है । शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से लेकर दशमी तक मध्यम बली, शुक्ल एकादशी से लेकर कृष्ण पंचमी तक पूर्ण बली और षष्ठी से लेकर अमावस्या तक यह बलहीन हो जाता है । जब चन्दमा उत्तर में रहे और घडी के गति से चले या वह किसी ग्रह के साथ रहे या उससे दृष्ट हो तो यह बलवान हो जाता है । चन्द्रमा राशि के प्रारम्भ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक मध्यम बली और २१ से ३० अंश तक पूर्ण बली हो जाता है। 

            मंगल-

                     दक्षिणायन के राशि में, रात्रि में, मकर-कुम्भ और मीन राशि में होने पर, युद्धरत होने पर तथा तीव्र गति में होने पर बलवान होता है । मंगल अपनी उच्चराशि में, स्वक्षेत्री होने पर, स्वाराशिस्थ होने पर और अपने द्रेष्काण में रहने पर भी बलवान होता है । जब मंगल दसवें भाव में अपनी राशि का रहता है या  अन्य किसी भी राशि में रहता है तब वह बलवान हो जाता है । मंगल राशि के प्रारम्भ में १ से १० अंशों तक पूर्ण बली, ११ से २० अंश तक कमजोर और २१ से ३० अंश तक मध्यम बली हो जाता है ।  

             बुध-

                            सूर्य से १० अंश की दूरी पर रहने से बलवान हो जाता है । बुध अपनी राशि, नवांश, अपने द्रेष्काण में, उत्तरायण में, दिन और रात्रि में बलवान हो जाता है । बुध वक्री गती में होने पर भी बलवान हो जाता है । राशि के प्रारम्भ से १० अंश तक मध्यम बली, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली तथा २१ से ३० अंश तक बुध बलहीन हो जाता है । मिथुन राशि का भी बुध यदि अपने द्रेष्काण मे रहे तो बलवान हो जात है ।   

             बृहस्पति-

                                अपनी राशि मे, कर्क या वृश्चिक राशि में, उत्तरायण में, दोपहर में, अपने द्रेष्काण तथा नवांश में भी बलवान हो जाता है । बृहस्पति किसी भी ग्रह के साथ विजयी मुद्रा में रहने पर भी बलवान हो जाता है । बृहस्पति १ से १० अंश तक मध्यम बली, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली तथा २१ से ३० अंश तक बलहीन हो जाता है। 

           शुक्र-

                   तीसरे, छठे और बारहवें भाव में होने पर, सूर्य से आगे होने पर , दोपहर में और वक्री होने पर भी बलवान हो जाता है । शुक्र अपनी राशि में उच्च राशि का होकर उत्तरायण में होने से बलवान हो जाता है । शुक्र राशि के प्रारम्भ के १ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली और २१ से ३० अंश तक मध्यम बली होता है । शुक्र, चन्द्रामा के साथ होने पर और ग्रहों के साथ विजयी मुद्रा में होने पर भी बलवान हो जाता है ।

           शनि-

                            कृष्ण्पक्ष मे, रात्रि में, वक्री होने पर, अपनी राशी में, उच्च राशि तुला में होने पर, दक्षिणायन में और रात्रि में उदय के समय में बलवान होता है । शनि लग्न में बैठकर किसी भी धीमी गति वाले ग्रहों के साथ बैठकर और विजयी मुद्रा में होने पर भी बलवान हो जाता है । शनि राशी के प्रारम्भ के १ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक मध्यम बली और २१ से ३० अंश तक पूर्ण बली हो जाता है । अन्य आचार्यों का मत है कि शनि हमेशा बलवान होता है। 

            राहु-

                   मेष, वृष, कर्क, वृश्चिक और कुम्भ राशि का होने पर बलवान होता है । राहु मेष, और चन्द्रामा के साथ होने पर तथा राशि की समाप्ति में सूर्य और चन्द्रामा की परिधि में होने पर बलवान होता है। 

            केतु-

                  धनु राशि के उत्तरार्द्ध में ,मीन, कन्या और वृश्चिक राशि में तथा कन्या राशि में भी बलवान होता है। केतु राशि के प्रारम्भ में तथा इन्द्रधनुष के उदय के समय में भी बलवान होता है। 

             शुभ ग्रह यदि बलवान होता है तो वह व्यक्ति को निश्चय ही भाग्यशाली, ज्ञानी, सुन्दर तथा सम्पन्न बनता है तो दूसरी तरह पापग्रह बलवान होकर के व्यक्ति को मूर्ख, अज्ञनी तथा भाग्यहीन बनाता है एवम्‌ अपने अनुरुप फल देता है। 

 

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सन्दर्भ  – होरासार

* मराठी मध्ये वाचण्यासाठी इथे क्लिक करा. 

 

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Uttam Gawade

श्री उत्तम गावडे

ज्यो. विशारद, वास्तु विशारद

 9901287974, 8722745745

 

शिल्पसंहिता – (भाग -२)

मागच्या भागात पाहीले की संहितेत तीन खंड कोणते आहेत आता पाहू दहा शास्त्रे –

१) धातूखंडात तीन शास्त्रे येतात. अ) कृषि  ब) जल   क) खनिज

२) साधनखंडात तीन शास्त्रे येतात. अ) नौका  ब) रथ   क) विमान

३) वास्तुखंडात चार शास्त्रे येतात. अ) वेश्म  ब) प्राकार  क) नगररचना   ड) यंत्र

           शिल्पसंहितेत एकंदर दहा शास्त्रांचा अंतर्भाव होतो. ती दहा शास्त्रे व त्यांतील विषय पुढे दिल्या प्रमाने आहेत.

 

१) कृषिशास्त्र – कृषी म्हणजे शेती असे हल्ली मानण्यात येते, पण शिल्पामध्ये कृषी हा शब्द अधिक व्यापक अर्थाने वापराला आहे.  वृक्ष(झाडे), पशू (जनावरे) व मनुष्य यांची शरीररचना व गुणधर्म कोणते, त्यास योग्य वळण कसे लावावे व त्याचा उपयोग कसा व कोठे करावा हे याशास्त्रात सांगितले आहे. म्हणजेच वृक्ष, पशू व मनुष्य या तिघांचे प्रसव व पालन ही कामे कशी करावी, हे विषय कृषी शास्त्रात येतात. आजच्या भाषेत कृषीलाच आपण जीवशास्त्र म्हणू शकतो.

 

२) जलशास्त्र   – संसेचन म्हणजे पाणीपुरवठा, पाणी कसे मिळवावे, हव्या असलेल्या ठिकाणि कसे न्यावे, संहरण म्हणजे अधिक झालेले पाणी काढून टाकणे व स्तंभन म्हणजे पाणी अडवून धरणे या गोष्टी जलशास्त्रांतर्गत येतात.

 

३) खनिजशास्त्र – खाणीतून मातीपासून, दगड, धातू इ. पदार्थ असे काढावेत, काढलेले पदार्थ शुद्ध कसे करावेत, त्यांचे गुणधर्म कोणते, हवे असलेले गुण अथवा शुद्ध पदार्थ प्राप्तीसाठी अनेक पदार्थ कसे एकत्र करावेत तसे मिसळलेल्या पदार्थामधून घटक द्रव्ये पुन्हा वेगळी अशी करावीत हे सर्व खनिजशास्त्रांतर्गत येते.

 

४) नौकाशास्त्र  – पाण्याचे गुणधर्म कोणते, त्यावर कसे तरावे व तरण्यासाठी तरफे, नावा व जहाजे कशी तयार करावीत, पाण्यावरून नौका अथवा जहाजाने माल वाहणे इ गोष्टी या शास्त्रांतर्गत येते.

 

५) रथशास्त्र  –  जमिनीवरून माल इकडुन तिकडे कसा न्यावा, त्यासाठी रस्ते, पुल, घाट, बोगदे कसे बांधावेत, रथ, गाड्या वगैरे कशा तयार कराव्यात हे या शास्त्रांतर्गत येते.

 

६) विमान शास्त्र – किल्याला वेढा पडून सभोवार आग लावली तर त्या आगीवरून कसे उडत जावे, विमान कसे बनवावे व कसे चालवावे, वैमानिक कसा असावा, त्याला कोणकोणत्या गोष्टींचे ज्ञान असावे या गोष्टी या शास्त्रांतर्गत येते.

 

७) वेश्मशास्त्र (वास्तुशास्त्र) – वेश्म म्हणजे घर. मनुष्याचे ऊन, वारा, पाऊस वगैरे पासून रक्षण व्हावे म्हणून पानांपासून ते राजमहल किंवा दगडात कोरून केलेल्या लेण्यांपर्यंत निवाऱ्याच्या जागा कशा निर्माण कराव्यात हे वेश्म या शास्त्रांतर्गत येते.

 

८) प्राकार शास्त्र  – हिंस्त्र पशू, रानटी लोक, शत्रू वगैरेंच्या त्रासापासून आपले संरक्षण असे करावे व त्या त्रास देणाऱ्यांचा नाश कसा करावा हे या शास्त्रात सांगितले आहे. दुर्ग, किल्ले इ. गोष्टींचा समावेश सुद्धा या शास्त्रांतर्गत होतो.

 

९) नगररचना शास्त्र   – गावे, शहरे, बंदरे, राजधान्या कशा वसवाव्यात, त्यात कोणकोणत्या सोई असाव्यात व त्यांची व्यवस्था कशी ठेवावी हे या शस्त्रांतर्गत येते. नगरात आठ बाबींचा विचार केलेला असतो. प्रपा म्हणजे पिण्याच्या पाण्याचा पुरवठा, मंडप किंवा धर्मशाला, आपण म्हणजेच बाजारपेठ, राजगृह – सरकारी कार्यालये, लोकवस्ती, देवालय, नगर सुरक्षा व आराम म्हणजेच बागा अथवा वाटीका म्हणजेच करमणुकीची साधने.

 

* एक कुटुंब राहण्याच्या घरास वेश्म म्हणतात, युद्धाच्या वेळी उपयोगी पडणारे ते प्राकार व पुष्कळ घरे एकत्र असतात ते नगर. सध्या या तिन्हीना मिळून वास्तुशास्त्र मानण्यात येते.

 

१०) यंत्रशास्त्र – माणसे किंवा जनावरे यांची शक्ती लावून मोठमोठी अवजड कामे कशी करून घ्यावीत, पाणी वारा वगैरे सृष्टीतील शक्तिंची मदत या कामी कशी घ्यावी हे या शास्त्रांतर्गत येते.

 

        याप्रमाणे शिल्पसंहितेत एकंदर दहा शास्त्रांचा समावेश होतो. आपली संस्कृती खूप प्राचिन व पुर्णत्वास पोहचली होती हे यावरून सहज लक्षात येते. त्याकाळात सुधारलेल्या समाजाचे काम सुयंत्रपणे चालवण्याइतके शास्त्रीय ज्ञान आपल्या पूर्वजांनी मिळवून ग्रंथरूपाने सुरक्षित करून ठेवले होते. दुर्दैवाने आज त्यातील अनेक ग्रंथ काळाच्या ओघात लुप्त झाले आहेत पण जे आहेत ते ही आपल्या पुर्वजांच्या ज्ञानाची व्याप्ती दाखवण्यास पुरेसे आहेत.

 

पुढील भागात पाहून ३२ विद्या व त्याअंतर्गत येणाऱ्या ६४ कला…. क्रमश:……….


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रमल विद्या परिचय

         भविष्य कथन की विभिन्न पद्धतियों में से ‘रमल’ एक बहुत पुरातन पद्धति है। ‘रमल’ शास्त्र (पद्धति) प्रश्नों के उत्तर देने में और भविष्य कथन करने में पूर्णरूप से सक्षम है। रमल शब्द अरबी भाषा से संबंधित है, जिसका अर्थ है गोपनीय बात अथवा वस्तु को प्रकट करना।  लेकिन व्याकरण अनुसार ‘रमल’ उस विद्या का नाम है जिससे भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान हो सकता है। ‘रमल’ अरबी भाषा में बालू अर्थात रेत को भी कहते हैं।

          अन्य एक मतअनुसार पार्वती के द्वारा प्रश्न विद्या के ज्ञान के बारे में सवाल किए जाने पर भगवान शिव के मस्तक पर स्थिर चंद्रमा से अमृत की चार बूंदें गिरीं, जो क्रमशः अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी तत्त्व की प्रतीक थीं। इन्हीं बिंदुओं पर आधारित इस रमल ज्योतिष में सोलह शक्लों के रूपक बने, जो इस विद्या के आधार रूप हैं। वैसे भी शास्त्र द्वारा प्रमाणित होता है कि यह विद्या ‘भारत‘ से ही अरब देशों में गई तथा वहां खूब प्रचलित हुई और भारत में विलुप्त सी हो गई, क्योंकि इसके आधार शास्त्र प्राचीन ‘प्राकृत‘ भाषा में थे और बाद में अरबी और फारसी में लिखे गए। संस्कृत एवं हिंदी साहित्य में यह बहुत ही कम उपलब्ध है। कालांतर में यह विद्या, विलुप्त हो जाने के बाद, पुनः जब भारत में कुछ व्यक्तियों द्वारा लाई गई, तब यह विद्या पुनः प्रकाश में आई। लेकिन वर्तमान काल में यह पद्धति लुप्त सी हो रही है। फिर भी कुछ लोग हैं जो इस ‘रमल’ पद्धति के रहस्यों को भलीं भांति समझते हैं और उसे प्रयोग में लाते हैं। ऐसे लोगों की संख्या गिनी-चुनी है। ‘रमल’ पद्धति पर बहुत कम पुस्तकें उपलब्ध हैं और जो है वह अधिकांश उर्दू और फारसी भाषा में है। इसी कारण से इस पद्धति के जानकार कम मिलते हैं।

        रमल का पासा – रमल पद्धति में रमल कुंडली बनाने की सर्वश्रेष्ठ विधि पांसा द्वारा ही मानी गई है। यह पांसा सप्त धातु का बनाया जाता है यह 12 तोले से कम नहीं होना चाहिए। जिस दिन, दिन और रात बराबर हों अर्थात सायन मेष की संक्रांति हो उस दिन सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्ता, सीसा और पारा को एक साथ गला कर चैपहले 8 पांसे बनाए जाते हैं। चार-चार पांसो के मध्य में आर-पार छेद कर एक कील या मोटी तार पर चारों को इस प्रकार पहना देते हैं कि वह कील के चारों ओर आसानी से घूम सके, इसी प्रकार शेष चार पांसों को भी कील पर पहना देते हैं। इस प्रकार 8 पांसे दो कीलों पर अलगअलग चार के ग्रुप में बन जाते हैं। हर चैपहले गुटिका पर निम्नलिखित रूप में खुदवाये जाते है प्रथम पटल पर ‘रू’, प्रथम पटल के ठीक नीचे वाले पटल पर ‘रूरू’, दूसरा पटल पर ‘∴’, और दूसरे पटल के ठीक सामने।

      जब प्रश्नकर्ता प्रश्न करता है तो उस समय पांसे डालकर उस पर अंकित रूपों को ध्यान से देखें। पांसो के प्रयोग में रूप (शक्ल) की गिनती दाहिने से बांये की होती है। हर रूप में चार तत्व अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी होते हैं। मान लें पांसे डालकर पांसे इस प्रकार पड़ें।

      रमल पद्धति का मूल आधार सोलह रूप अर्थात् शक्लें और सोलह ही स्थान है। यह रूप (शक्लें) चार बिंदू (0) और रेखा (-) के अनेक क्रम परिवर्तन से उत्पन्न होते हैं। रमल पद्धति में सोलह रूप और उनके नाम इस प्रकार है। 1. लह्यान, 2. कब्ज़ुल दाखि़ल , 3 कब्जु़ल ख़ारिज 4. जमात 5. फ़रहा, 6. उक़ला, 7 अंकीस 8. हुमरा, 9 बयाज, 10. नस्त्रुतुल ख़ारिज, 11. नस्त्रुतुल दाखि़ल , 12. अतबतुल ख़ारिज 13. नकी 14. अतबतुल दाखि़ल, 15. इज्जतमा, 16. तारीक । जिस क्रम में यह सोलह रूप रखे गये हैं इसे सकन पंक्ति कहते हैं। यह मूल पंक्ति है। और रमल कुंडली के स्थिर स्थानों के रूप भी यही है।

        रमल पद्धति में तत्वों का महत्व – हर रूपों का संबंध चार तत्वों से है अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी। यह तत्व रूप के ऊपर से नीचे के क्रम में रहते हैं। सबसे ऊपर ‘बिंदू’ या ’रेखा’ अग्नि तत्व उसके बाद वायु, जल और पृथ्वी तत्व होता है। उदाहरण: अग्नि वायु जल पृथ्वी। इन्हीं तत्वोंके आधार पर ही रूपों की शुभता और अशुभता का अंदाजा लगाया जाता है जो फल कथन में लाभकारी होता है। रूपके जिस तत्व पर ‘बिन्दू’ आता है वह तत्व खुला कहलाता है और जिस तत्व के स्थान पर ‘रेखा’ आती है वह तत्व बंद कहलाता है। इसी तरह जिस रूप में अग्नि तत्व खुला है और पृथ्वी तत्व बंद है खारिज रूप कहलाता है। यह रूप है। जिस रूप में अग्नि तत्व बंद हो और पृथ्वी तत्व खुला हो वह रूप दाखिल कहलाता है यह रूप होते हैं। जिस रूप में अग्नि और पृथ्वी तत्व खुले हों मुन्कलिव कहलाते हैं। यह रूप होते हैं। जिस रूप में अग्नि और पृथ्वी तत्व बंद होते हैं वो साबित कहलाते हैं।


– ज्योतिष जगत द्वारा संकलित

Tarot -Card For The Week

Card For The Week –

26TH NOVEMBER TO 2ND DECEMBER 2017

This is a fantastic card which signifies the perfect balance between family and business (career). If you are quite confident you can very well manage both the fields with equal enthusiasm.

You will find yourself well established not only in your business but will also find a heart place in your family too.

This card conveys that the coming days are going to pay you well returns of your efforts. This can be in the form of materialistic gain or in the form of great honour, love, care, etc.

This is the card of content. You will lead to the feel of achievement. You will find that your financial needs are almost done.

Relax for a while and enjoy with your family.

 


Vrushali N

Vrushali N

Tarot Reader

9663454836

 

साप्ताहिक राशिभविष्य 26 नोव्हेंबर ते 02 डिसेंबर2017

[रविवार २६ नोव्हेंबर २०१७ ते शनिवार   ०२ डिसेंबर २०१७ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट- शुक्र २५ नोव्हेंबर रोजी  राशीतून तुला  वृश्चिक राशीत तर  मंगळ – २९ नोव्हेंबर रोजी  कन्या राशीतून तुला राशीत जात आहे. या आठवड्यात मंगळ व शुक्र ग्रहा व्यतिरिक्त (चंद्र सोडून ) इतर कोणताही ग्रह राशीपालट करीत नाही आहे.]

 

मेष – व्यावसायिक प्राप्तीत वाढ होईल. नौकरदारांना फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीला वाहन खरेदीचे योग येतील. विद्यार्थ्यांना आत्मविश्वास थोडा कमी राहील. जोडीदाराबरोबर किरकोळ वाद होतील. सरकारी कामात विलंब निर्माण होईल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

वृषभ – उद्योग-व्यवसायात आवक कमी राहील. नौकरीमध्ये संमिश्र परिणाम मिळतील. संततीच्या नित्य कामात बाधा येणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना परिश्रमाने यश मिळेल. सरकारी कामात दिरंगाई निर्माण होतील. जोडीदाराच्या हटवादी वागण्याचा त्रास होईल. कफाच्या विकारांपासून काळजी घ्यावी. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. शुभ ता. २६, २७, २८, २९.

 

मिथुन – व्यावसायिक आवक चांगली राहील, परंतु आर्थिक निर्णय विचारपूर्वक घ्यावेत. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ चांगली मिळेल. संततीच्या प्रश्नांमधून योग्य मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. सरकारी कामास अनुकूलता राहील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. प्रवास संमिश्र फळे देतील. शुभ ता. २८, २९, ३०, १, २.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीमुळे खर्चाचे प्रमाण वाढते राहील. विद्यार्थ्यांना कष्टाने सफलता मिळेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. स्थावराच्या संधी चालून येतील. वडिलांबरोबर वादाचे प्रसंग येतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १, २.

 

सिंह –  संततीच्या कामात अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना कष्टसाध्य यश मिळेल. कौटुंबिक अडचणीतून मार्ग निघतील. व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये नियोजित कामे यशस्वी होतील. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

कन्या –  व्यवसायात आर्थिक निर्णय लाभ देतील. नौकरीमध्ये नियोजित कामात यश मिळेल. कौटुंबिक वातावरण संमिश्र राहील. सरकारी कामासाठी अनुकूलता राहील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. संततीच्या प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. शुभ ता. २६, २७, २८, २९.

 

तुला – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. कौटुंबिक बाबतीत वडिलधाऱ्यांचा सल्ला लाभ देईल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. संततीच्या नौकरीविषयक प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रवास लाभ देतील. मित्र-मंडळींच्या ओळखीचा फायदा होईल. शुभ ता. २८, २९, ३०, १, २.

 

वृश्चिक – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. अचूक आर्थिक अंदाजामुळे फायदा होईल. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. रागांवर नियंत्रण ठेवावे लागेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. पोटाचे विकारांपासून काळजी घ्यावी. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १, २.

 

धनु –  उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध तडजोड करावी लागेल. संततीच्या कामात अडथळे येतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामात अडचणी येतील. अनावश्यक खर्चावर नियंत्रण ठेवावे लागेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २६, २७.

 

 

मकर –  व्यावसायिक आवक वाढेल. नौकरदारांना समाधानकारक परिणाम मिळतील. संततीच्या कामात दिरंगाई निर्माण होईल. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. सरकारी कामे यशस्वी होतील. अनपेक्षित खर्चाचे प्रसंग येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २८, २९, ३०.

 

कुंभ –  उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ मिळेल. संततीच्या बाबतीत शुभ परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश लाभेल. सरकारी कामातून यश मिळेल. वडिलधाऱ्यांचा सल्ला हितकारक ठरेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

मीन – संततीच्या बाबतीत फारसे बदल जाणवणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. वाहनांच्या वेगांवर योग्य नियंत्रण ठेवावे. शुभ ता. २८, २९, ३०.


सौजन्य – दाते पंचांग

हस्त रेखा परिचय

         हस्त सामुद्रिक शास्त्र को सीधे तरीके से दो भाग में बात सकते है। १) हस्ता लक्षण शास्त्र और २) हस्त रेखा शास्त्र। हस्त लक्षण शास्त्र में हाथ की बनावट, रंग, आकार, स्पर्श अदि के माध्यम से व्यक्तिका स्वभाव जाना जा सकता है तो हस्त रेखा शास्त्र में रेखाओंके मध्यमा से भविष्य में होनेवाली घटना क्रम को जानने की कोशिस की जाती है। आज हम देखेंगे हस्त रेखाओंके बारे में।

       हाथ पर सात (७) प्रमुख रेखाएं और पांच (५) गौण रेखाएं होती हैं। प्रमुख रेखाए  इस प्रकार है।

१) जीवन रेखा :-

इस रेखा को आयु रेखा भी कहते हैं। यह बृहस्पति पर्वत के ठीक नीचे से चलती है और शुक्र पर्वत को घेरती हुई नीचे की ओर बढ़ती है।  इस रेखा के विश्लेषण से आयु काल, बीमारी, मृत्यु आदि के बारे में जाना जा सकता है। यह रेखा लंबी, संकरी, गहरी और अनियमितताओं से रहित हो, और टूटी हुई न हो और इस पर कोई चिह्न न हो तो शुभ होती है। शुभ जीवन रेखा व्यक्ति के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं स्फुर्ति की सूचक होती है।

२) मस्तिष्क रेखा :-

मस्तिष्क रेखा तीन विभिन्न स्थानों से आरंभ हो सकती है- 1. गुरु पर्वत के केंद्र से 2. जीवन रेखा के आरंभ से 3. जीवन रेखा के भीतर मंगल क्षेत्र से इस रेखा के विश्लेषण से व्यक्ति की प्रतिभा, ऊर्जा, लक्ष्य, दृढ़ता, तर्कक्षमता आदि के बारे में जाना जाता है।

३) हृदय रेखा :-

हृदय रेखा बृहस्पति क्षेत्र से आरंभ होकर सूर्य पर्वत को पार करती हुई बुध पर्वत के मूल तक जाती है। इस रेखा से भावुकता, प्रेम संबंध, मन की स्थिति आदि का विचार किया जाता है।

४)स्वास्थ्य रेखा :-

स्वास्थ्य रेखा बुध पर्वत क्षेत्र से आरंभ होकर नीचे की ओर जाती है। इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य, बीमारी, असाध्य रोगों आदि का विचार किया जाता है।

५) सूर्य रेखा :-

सूर्य रेखा का आरंभ जीवन रेखा, चंद्र पर्वत क्षेत्र, मंगल पर्वत क्षेत्र, मस्तिष्क रेखा अथवा हृदय रेखा कहीं से भी हो सकता है। इसे प्रतिभा रेखा अथवा सफलता रेखा भी कहा जाता है।

६) भाग्य रेखा :- 

भाग्य रेखा जीवन रेखा, मणिबंध, चंद्र पर्वत, मस्तिष्क रेखा या फिर हृदय रेखा से आरंभ होकर मध्यमा के पर्वत तक जाती है। भाग्य रेखा के विश्लेषण से कार्य व्यवसाय, कूटनीति, लोकप्रियता आदि का विचार किया जाता है।

७) विवाह रेखा :-

विवाह रेखा कनिष्ठिका अंगुली के नीचे और ह्रदय रेखा के उपरसे बुध पर्वत पे चलती है। विवाह रेखा के विश्लेषण से विवाह ,प्रेमसंबंध, वैवाहिक जीवन तथा जीवन साथी के विषय में विचार किया जाता है।

 

गौण रेखाएं : हाथ में निम्नलिखित पांच गौण रेखाएं पाई जाती हैं। गौण रेखाए कोनसी है इसमें काफी मतभेद पाए जाते है। ज्यादातर विशेतज्ञ नीचे दी गयी रेखाओंको प्रमुख गौण रेखाए मानते है।  

१) मंगल रेखा :-

यह मंगल पर्वत से प्रारंभ होकर जीवन रेखा की ओर जाती है। इससे शौर्य, आत्मविश्वास, क्रोध आदि का विश्लेषण किया जाता है।

२) वासना रेखा :-

यह स्वास्थ्य रेखा के समानांतर होती है। इस रेखा से स्त्री अथवा पुरुष की काम भावना का विश्लेषण किया जाता है।

३) अंतरज्ञान रेखा :-

यह बुध पर्वत क्षेत्र से आरंभ होकर चंद्र पर्वत क्षेत्र की ओर जाती है। यह अर्द्धवृत्ताकार होती है। इससे पुरुष अथवा स्त्री के आंतरिक व्यक्तित्व भौतिकता, धर्म, ऋद्धि-सिद्धि आदि के बारे में विचार किया जाता है।

 ४) शुक्र कंकण (मेखला) :-

तर्जनी और मध्यमा के बिच में से शुरू होकर अमानिका और कनिष्ठिका के बिच में समाप्त होती है। (शनि और रवि पर्वत को घेरे हुए रहने वाली रेखा ) इस रेखा से कामवासना, कलाप्रियता, सौंदर्यप्रियता के बारे में विचार किया जाता है। 

५) मणिबंध रेखाएं :-

ये कलाई में पाई जाती हैं। इन रेखाओं को अन्य रेखाओं के साथ विश्लेषण कर उन्नति, भाग्यवृद्धि, विदेश यात्रा आदि का विचार किया जाता है।


ज्योतिष जगत द्वारा संकलित 

 

इसे भी पढ़े हस्त रेखा अध्ययन के सामान्य सिद्धांत  

   राजयोग के सामुद्रिक लक्षण

 

 

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शिल्पसंहिता – (भाग -१)

              शिल्प म्हणजे मुर्ती आणि शिल्पशास्त्र म्हणजे मुर्ती इ. घडविण्याची कला अगर शास्त्र असाच बहुतेकांचा समज असतो. पण शिल्पशास्त्र अगर शिल्पसंहिता या शब्दाचा इतका मर्यादीत अर्थ नाही आहे. शिल्प शब्दाचा अर्थ यापेक्षा अधिक व्यापक आहे.

 

              शिल्प याचा अर्थ – “यत्‌ शीलयति समा धाति तत्‌शिल्पें”  ‘जे मनाला समाधान देते ते अथवा जे दु:ख निवारण करते ते शिल्प’ असा आहे.

   

         कश्यपसंहिता ही सर्वप्रथम संहिता मानण्यात येते. त्यानंतर १८ संहिताकारानी संहिता लिहिल्याचा उल्लेख अढळतो. पण यातल्या बहुतेक आता उपलब्ध नाहीत. सद्या केवळ कश्यपसंहिता, भृगुसंहिता व मयसंहिता या तीनच संहिता उपलब्ध असल्याचे अढळते. *(ज्योतिषशास्त्रांतर्गत येणाऱ्या संहिता व शिल्पशास्त्रांतर्गत येणाऱ्या संहिता वेगवेगळ्या आहेत.)

     

          आपल्या प्राचिन ऋषीमुनींनी ज्ञानासंबंधीची जी रितसर मांडणी केली आहे तीचा जरा विचार करू.

          अगदी पहीले ज्ञान म्हणजे प्रत्यक्ष अनुभव, असे अनुभव आले म्हणजे त्यांचे हितकर-अहितकर असे भेद पाहून जो त्यांचा आढावा घेतात त्याला “कला” (Art Or Skill) म्हणतात. अशा अनेक कला एकत्रित करून त्यांचे नियम ठरविले तर ती “विद्या” होते. अनेक विद्यांचे संकलित स्वरूप म्हणजे “शास्त्र” व अनेक शास्त्रे एकत्र सूचित झाली म्हणजे त्यास “संहिता” म्हणतात.

      याप्रमाणे शिल्पात संहिता, शास्त्रे, विद्या व कला याचा कसकसा अंतर्भाव होतो तो पाहू.

         

          शिल्पसंहितेच्या अंतर्गत तीन(३) खंड, दहा (१०) शास्त्रे, बत्तीस (३२) विद्या व चौसष्ट (६४) कला यांचा अंतर्भाव होतो यावरून शिल्पशास्त्राच्या व्यापकतेचा अंदाज येऊ शकतो.

 

शिल्पसंहितेच्या अंतर्गत तीन खंड येतात ते असे –

 

धातूनां साधनानां च वास्तूनां शिल्प संज्ञितं ॥ भृगुसंहिता अ.१

 

१) धातूखंड  २) साधनखंड   ३) वास्तुखंड

 

      सृष्टीत कोणती वस्तू कोठे व कशी निर्माण झाली आहे, त्याची उत्पत्ती कशी झाली व ती कशी मिळवावी हे सांगणारे ते धातूखंड. इंग्रजीत याला  Exploration (शोध) म्हणू शकतो. सृष्टीत निर्माण झालेली वस्तू मिळविल्यावर ती आपणास हव्या त्या ठिकाणी कशी घेऊन जावी यासंबंधीची व्यवस्था म्हणजे साधनखंड. इंग्रजीत याला  Conveyance  (वाहन) म्हणू शकतो. प्राप्त वस्तू वापरण्या योग्य बनविणे अगर त्यात निवास करता येण्याजोगी बनविणे म्हणजे वास्तुखंड. इंग्रजीत याला  Habitation  (निवास) म्हणू शकतो.

 

कृषीजलं खनिश्चेति धातुखंड त्रिधामतं ॥ भृगुसंहिता अ.१

   धातूखंडात तीन शास्त्रे येतात. 1) कृषि  2) जल   3) खनिज

 

 नौका-रथाग्नि-यानानां कृति: साधन मुच्यते ॥ भृगुसंहिता अ.१

   साधनखंडात तीन शास्त्रे येतात. 4) नौका  5) रथ   6) विमान

 

वेश्म प्राकार नगररचना वास्तु संज्ञितं ॥ भृगुसंहिता अ.१

   वास्तुखंडात चार शास्त्रे येतात. 7) वेश्म  ब) प्राकार  8) नगररचना   9) यंत्र

 

    यावरुन आपण शिल्पसंहिता (शिल्पशास्त्र) हे इंग्रजीतील  Engineering या शब्दापेक्षा जास्त व्यापक आहे असे म्हणू शकतो.

 

    ज्याला आज आपण वास्तुशास्त्र म्हणतो ते या शिल्पामधील  वास्तुखंडामधील चार शास्त्रामधील एक शास्त्र (भाग) आहे. तर असे हे वास्तुशास्त्र जर शिल्पसंहितेचा केवळ एक छोटासा भाग असेल तर मग शिल्पसंहितेची व्याप्ती किती असेल याचा विचार करा.

    पुढील भागात या दहा शास्त्रांविषयी अधिक माहिती घेऊन त्यात येणाऱ्या ३२ विद्या व ६४ कला कोणत्या आहेत ते पाहु.

क्रमश:……


हे लेखही वाचा ……..

 

वास्तु पुरुष जन्मकथा

वास्तु आणि पंचतत्वे (पंचमहाभूते)

प्राचीन भारतीय शिल्पशास्त्र

शिल्पसंहिता – भाग २

 


uttam gawade

श्री उत्तम गावडे

ज्यो. विशारद, वास्तु विशारद

 9901287974, 8722745745


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डाऊझिंग, पेंड्युलम किंवा लोलक विद्या….

 ज्योतिष्यशास्त्र हे मुलत: भविष्यातील घटना जाणून घेण्यासाठी निर्माण झाले आहे. यामध्ये विविध विषयांचा व विद्यांचा समावेश आहे. त्यात प्रामुख्याने होरा किंवा कुंडली शास्त्र, हस्तसामुद्रिक, अंकज्योतिष्य, रमलविद्या डाऊझिंग वा लोलक विद्या इ. शास्त्रे मूलभुत आहेत. ह्या सर्व शास्त्रांचा विस्तार भूमिका अमर्याद आहे व सिध्दांत ठरविण्यास लागणारी साधनसामुग्री (वैयक्तिक अनुभव) जितकी अधिकात अधिक असेल तितकी विशेष सहाय्यक ठरते व त्यामुळे फलितात अचुकता निर्माण होण्यास मदत होते. प्रस्तुत लेखात डाऊझिंग वा लोलकविद्येबाबत संयुक्तीक विचार मांडले आहेत ते वाचकांना फारच उपयुक्त ठरतील अशी अपेक्षा आहे.

Belgaum Maratha Matrimony

Belgaum Maratha Matrimony

                   या विश्वात अशा अनेक घटना घडतात की ज्या घटनांचा कार्यकारणभाव आधुनिक विज्ञानाच्या सहाय्याने सिध्द करणे केवळ अशक्यच आहे. त्याप्रमाणे अशाही काही विद्या आहेत की ज्यांचा अनुभव येतो व उपयोगही होतो परंतु त्या विद्यांच्या आधारे सांगितल्या जाणाऱ्या गोष्टींना नेमका कोणता शास्त्रीय आधार आहे हे अजुन तरी सांगता आलेले नाही.  या अशा विद्यांमध्ये डाऊझिंग किंवा लोलक विद्या येते. या विद्येचा मुख्य उपयोग भूगर्भातील पाणी (प्रवाह किंवा स्त्रोत) शोधण्यासाठी होतो. यासाठी इंग्रजी वाय अक्षरासारखी किंवा आकाराची झाडाच्या फांदिचा उपयोग करण्यात येतो. काही वेळेस दोन ताब्यांच्या तारांचाही उपयोग केला जातो. या फांदिमुळे भूगर्भातील पाणी नेमक कोणत्या ठिकाणी आहे याचा शोध घेता येतो. या डऊझिंग विद्येमध्ये लोलक (रुद्राक्ष-पेंड्युलम) विद्येचाही उपयोग करता येतो व या लोलक पध्दतीनुसार पाण्याच्या शोधा व्यतिरिक्त इतर अनेक गोष्टींचा शोध घेता येतो. उदा. असे ऐकीवात आहे की जर्मनीमधील काही होमिओपाथिक डॉक्टर अशा लोलकाचा किंवा लंबकाचा उपयोग करतात. एखाद्या रुग्णाला जो आजार झाला आहे त्या आजारवर चार पाच औषधातील अधिक गुणकारक औषध कोणते असू शकेल हे लंबकाच्या मदतीने काढता येते.


                       पुण्यातील प्रसिद्ध असलेल्या भालचंद्र ज्योतिर्विद्यालयाचे माननीय अध्यक्ष डॉ. एम. कटककर यांनी १९६० सालापासून या तंत्राचा उपयोग अनेक क्षेत्रांत केला आहे. लोलकाचा (रुद्राक्ष) उपयोग करुन हातावरील उंचवटे व रेषा किती कार्यक्षम आहेत व त्यामुळे त्या व्यक्तिच्या जीवनाचा आलेख कसा आहे याचे अचुक निदान त्यांनी कित्येक केसेसमध्ये केले आहे. त्याचप्रमाणे हातावरुन रोगनिदान किंवा शरिरातील रोगनिदान किंवा शरिरातील वेदनांचे मुख्य ठिकाण कोठे आहे. डाऊझिंग करणाऱ्या व्यक्तीला डाऊझर म्हणतात. या डाऊझिंग किंवा लोलक विद्येच्या आधारे नैसर्गिक तेल व वायुचे साठे, जमिनीखालील धातूंचे साठे, अशा अनेक गोष्टींच्या शोध घेता येणे शक्य होते.

 

  सिद्धांत:

                  आता प्रश्न पडतो की लोलक विद्या आहे तरी काय ? व लोलक दाखवित असलेल्या दिशा व फिरण्याच्या गतीवरुन अचुक निदान कसे होते व या मागील सिद्धांत किंवा तत्व आहे तरी काय ? या बाबतीत विविध प्रणाली आल्या व त्यानुसार या लोलकाव्दारे प्रश्नांची उकल कशी होते याचे गुढ समजाऊन सांगण्याचे प्रयत्न केले गेले. या सर्वात अधिक लोकप्रिय व मान्यता पावलेला विचार किंवा सिद्धांत पुढीलप्रमाणे आहे.

                  या विश्वातील प्रत्येक गोष्टीमध्ये विद्युत लोहचुंबकीय लहरी असतात त्याचप्रमाणे प्रत्येक व्यक्तीमध्ये “जैव विद्युत लोहचुंबकीय लहरी” असतात. या लहरींमुळे व्यक्तिला निर्सगातील उर्जेशी एकरुपाता साधता येते व काही गूढ गोष्टींचे आकलन होते ही एकरुपता किंवा तादात्म किंवा त्यापासून निर्माण होणारी जाणीव त्या व्यक्तीला त्याच्या हातातील वाय (Y) आकाराच्या फांदिमुळे अथवा हातातील लोककामुळे होऊ शकते व त्यात जाणीवेच्या आधारे ती फांदी एकदम खाली किंवा वरील वाजूस वळते व भूगर्भातील पाण्याचा साठा (प्रवाह वा स्त्रोत) नेमक कोठे आहे हे दर्शविते. हातात लोलक असल्यास ठराविक दिशेने गति घेवून तो लोलक फिरु लागतो. आता विश्वातील या लहरींबरोबर संपर्क साधण्याची हातोटी काही व्यक्तिनां निसर्गत:च असते, तर इतरांना ती काही साधना (अभ्यास) केल्याने प्राप्त होते. मात्र अचूक निदानासाठी त्यावेळी आपले मन निर्विकार असणे, एकाग्रता साधने व आपल्यातिल जैव विद्युत-चुंबकीयता वाढलेली असणे आवश्यक आहे.

 

  डाऊझिंग करण्याची क्षमता:-

                   डाऊझिंग करण्याची क्षमता एखाद्या व्यक्तित आहे किंवा नाही याचा प्रत्यय पाहणे असल्यास त्यांनी पुढील प्रयोग जरुर करुन पहावा. (आपला अनुभव मला जरुर कळवावा.)


                    कोणत्याही झाडाची (उदा. पेरुची) साधारण दीड हात लांबीची (सुमारे १८ इंच) बारीक लवचिक फांदी (इंग्रजी वाय (Y) या आकाराची) घ्यावी, फांदीची टोके (अ आणि ब) दोन्ही हातात धरुन (घेवून) छातीजवळ आणावेत व फांदीचे लहान टोक जमिनीला समांतर ठेवून, ज्या ठिकाणी जमिनीखाली पाणी असण्याचा जास्त संभव आहे, अशा ठिकाणी हळू हळू चालत जावे. (विहिर किंवा कूपनलीका), जमिनीखाली नैसर्गिक पाण्याचा प्रवाह वा स्त्रोत असेल व प्रयोग करणाऱ्या व्यक्तिची, वर नमुद केल्याप्रमाणे, सूप्तशक्ती जागृत होत असेल तर फांदीचे पुढील टोक आपोआप वर किंवा खालच्या बाजूस वळते व त्याची जाणीव स्वत:ला होते. पाण्याचा स्त्रोत किंवा प्रवाह मोठा असल्यास फांदि फिरण्यास जोर उत्पन्न होतो. हाच प्रयोग हातात लोलक किंवा नारळ घेवूनही पहता येतो. डाऊझिंग किंवा लोलविद्येचा उपयोग ऊठ-सूठ व सामान्य प्रश्नासाठी करणे गैर ठरेल व ते प्रयत्नवादास मारक ठरेल. काही वेळेस मतिकुंठीत करणारे प्रश्न अनाकलनीय समस्या, अवघड आजार, वास्तुदोष, संकटे निवार्णार्थ या विद्येचा उपयोग सहाय्यभूत म्हणून विश्वासपूर्वक केल्यास निश्चित मार्गदर्शक ठरवा असे वाटते. या बाबत लेखकाचा वरील विद्येचा अनुभव दोन तपा पेक्षा जास्त आहे.

 

हे लेख हि वाचा …..

                         डाऊसिंग कसे करतात …

                                                    डाऊसिंग काय आहे ? ….


सौजन्य / साभार – भाग्य संकेत २००४ च्या दिवाळी अंकातून प्रसिद्ध झालेला श्री मोहन दिवेकर पुणे यांचा लेख .

 

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साप्ताहिक राशिभविष्य 19 -25 नोव्हेंबर 2017

[ रविवार १९ नोव्हेंबर २०१७ ते शनिवार  २५ नोव्हेंबर २०१७ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट- बुध – २४ नोव्हेंबर रोजी वृश्चिक राशीतून धनु राशीत जात आहे. या आठवड्यात बुध ग्रहा व्यतिरिक्त (चंद्र सोडून ) इतर कोणताही ग्रह राशीपालट करीत नाही आहे.]

 

मेष – व्यावसायिक स्थिति ठीक राहील. नौकरीमध्ये बेफिकिर राहू नये. संततीच्या कामात दिरंगाई निर्माण होईल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. आर्थिक बाबतीत सावध रहावे लागेल. सरकारी कामात अडचणी निर्माण होतील. जोडीदाराबरोबर गैरसमजातून वाद होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. प्रवास लाभ देतील. शुभ ता. २४, २५.

 

वृषभ – उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये सहकाऱ्यांशी आर्थिक कारणावरुन वाद होतील. सरकारी कामात प्रयत्नास यश मिळेल. आर्थिक प्रलोभनांपासून दूर रहावे. संततीच्या कार्यात यश मिळेल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. खाणे-पिणे सांभाळावे. शुभ ता. १९, २०.

 

मिथुन – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये नियोजित कामात यश मिळेल. संततीच्या आर्थिक गोष्टी तपासून पहाव्यात. विद्यार्थ्यांनी वाईट संगतीपासून लांब रहावे. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. आर्थिक जोखीम पत्करु नये. स्थावराचे कामात यश मिळेल. प्रवासामधून कामे होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १९, २०, २१, २२.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. परंतु महत्वाचे आर्थिक व्यवहार शक्यतो टाळावेत. संततीच्या बाबतीत समाधान देणाऱ्या घटना घडतील. विद्यार्थ्यांना संमिश्र यश मिळेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. आर्थिक नुकसानीचे प्रसंग येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २१, २२, २३, २४, २५.

सिंह –  व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये अतिरिक्त जबाबदारीचे योग येतील. संततीच्या बाबतीत शुभ घटना घडतील. भावंडांशी आर्थिक व्यवहार टाळावेत. सरकारी कामात व्यत्यय निर्माण होतील. अनपेक्षित खर्चामुळे मेळ बसविणे कठीण जाईल. प्रवासात मौल्यवान वस्तू जपाव्यात. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २४, २५.

 

कन्या –  संततीच्या कामात व्यत्यय येतील. कुटुंबात आर्थिक बाबींबाबत संभ्रमावस्था निर्माण होईल. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये विसंबून राहून कामे करणे टाळावे. सरकारी कामात सफलता मिळेल. आर्थिक बाबतीत पारदर्शी रहावे. अविचारी कृती टाळावी. मित्रांकडून चांगले सहकार्य मिळेल. प्रवास लाभ देतील. शुभ ता. १९, २०.

 

तुला – व्यावसायिक स्थिति चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. संततीच्या बाबतीत फारसे बदल जाणवणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रलोभनांपासून दूर रहावे. सरकारी कामात संमिश्र सफलता मिळेल. प्रवास फायदेशीर ठरतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २१, २२, २३.

 

वृश्चिक – संततीच्या बाबतीत आर्थिक नुकसानीचे प्रसंग येतील. विद्यार्थ्यांना सहज यश मिळणार नाही. उद्योग-व्यवसायात प्रलोभनाला बळी पडून जोखीम घेऊ नये. नौकरीमध्ये आर्थिक अमिषाला बळी पडू नये. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. प्रवास फायदेशीर ठरतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १९, २०, २४, २५.

 

धनु –  व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध घटना घडतील. विवाहीत संततीच्या जीवनात त्रास होतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. सरकारी कामात व्यत्यय येतील. मोठ्या भावंडांबरोबर आर्थिक कारणांवरुन वाद होतील. प्रवासामधुन कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २१, २२, २३.

 

मकर –  उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ चांगली मिळेल. संततीच्या आर्थिक बाबींवर लक्ष ठेवावे. विद्यार्थ्यांना परिश्रमाने यश मिळेल. सरकारी कामे मार्गी लावता येतील. व्यावसायिक आर्थिक निर्णय घाईने घेऊ नयेत. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १९, २०, २४, २५.

 

कुंभ –  व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये कामाचे दडपण सतत वाढते राहील. संततीच्या बाबतीत चांगले परिणाम मिळतील. शेजाऱ्यांच्या भानगडीत पडू नये. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. प्रवासातून कामे सफलता दर्शवितात. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १९, २०, २१, २२, २३.

 

मीन – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये प्रलोभनांपासून दूर रहावे. सरकारी कामासाठी अनुकूलता राहील. वडिलधाऱ्यांचा विरोध सहन करावा लागेल. संततीच्या कामात अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना अपेक्षित यश मिळणार नाही. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २१, २२, २३, २४, २५.


सौजन्य – दाते पंचांग

कारक ग्रहाचे महत्व

                              फलज्योतिषशास्त्रातील काही सिद्धांत व नियम हे ज्या प्रमाणात महत्त्व देऊन अभ्यास करावयास पाहिजेत. त्या प्रमाणात अभ्यासले जात नाहीत. अनेक नियम नुसते वाचले जातात. डोळ्याखालून जातात, ज्योतिषांच्या तोंडी असतात पण कुंडली पाहताना त्याचा वापर, उपयोग कसा करता येईल, ह्याचे चिंतन केले जात नाही किंवा तशी अनूभूति अनेकांना आलेली नसते.

                    पंडित ज्योतिषी व अनुभव सिद्ध ज्योतिषी ह्यातील फरक मी स्वत: उत्तम अनुभवलेला आहे. आमच्या अगोदरच्या पिढीत एक ज्योतिषी अत्यंत मोठे पंडित होते. फलजोतिषशास्त्रावर भाषणेही उत्तम द्यावयाचे. दुसरे एक ज्योतिषी तसे फार न शिकलेले, भाषणबाजी फारशी न करता येणारे. पहिल्या ज्योतिषांचे पुस्तकी ज्ञान पुस्तकांत राहवयाचे पण दुसरे ज्योतिषी प्रत्यक्ष कुंडली पाहताना अचूक मर्म ओळखावयाचे व अचूक भविष्य सांगायचे, सांगावयाचे कारण ज्योतिषतत्त्वांचा अचूक वापर करता येणे महत्त्वाचे आहे.

                     निर्णायक घटक ठरवण्याच्या दृष्टीने सर्व सूत्रात मला जास्त अनुभवास आलेले सुत्र म्हणजे

  भावात भावपतेश्व कारकवशात फल योजयेत ।

                 कुंडलीवरुन जीवनातील कोणत्याहि गोष्टीचा अभ्यास, विचार करताना, त्या गोष्टीबद्दल भाकीत करताना तीन गोष्टींचा प्रामुख्याने विचार करावा लागतो. साकल्याने सारासार अभ्यासाने ज्या तीन गोष्टींकडे लक्ष द्यावे लागते. त्या तीन गोष्टी म्हणजे-

१) संबंधित गोष्टी संबंधी जे स्थान, जो भाव कुंडलीत असतो त्या स्थानाचा अभ्यास- त्या स्थानातील राशि, ग्रह वगैरे. (संबंधित गोष्टीसंबंधित भाव)

२) त्या स्थानाचा-भावाचा अधिपति-भावेश हा दुसरा महत्त्वाचा ग्रह. (संबंधित गोष्टीसंबंधित भावेश)

३) त्या गोष्टी संबंधी, त्या स्थाना संबंधीचा कारक ग्रह. (संबंधित गोष्टीसंबंधित कारक ग्रह) हा तिसरा महत्त्वाचा ग्रह ह्या तीन गोष्टीचा विचार करुन मगच अंतिम निर्णयाला यावे लागते.

  ह्या संबंधात कोणत्या गोष्टीत किती महत्व द्यावयाचे हा खरा कौशल्याचा व शास्त्रातील अनुभवाचा भाग असतो. उदाहरणार्थ सप्तमात मंगळ-शनि पाहिले की कोण्त्याही ज्योतिषाच्या मनांत द्विभार्यायोग होणार असे भाकीत करण्याची इच्छा होईल पण असे काही वर्तवण्यापूर्वी मी सांगत असलेला मंत्र जर तुम्ही लक्षांत ठेवलात तर तुमचे अनुमान फारसे चुकणार नाही.

  एखादी घटना, गोष्ट घडणे म्हणजे जे अंतिम फलीत ते फळासारखे आहे. ग्रहांची स्थानगत स्थिती ही बऱ्याच प्रमाणात बीज रुपने आहे. उदा. सप्तमात मंगळ+राहु ही पेरले म्हणजे त्यापासून फळ येईल असे नसते तर त्याचे झाड होऊन त्याला फुले आली पाहिजेत. तद्‌वत भावेश हा ग्रह फूल-पुष्य आहे. सप्तमांत मंगळ राहू असून बीज स्वरुपात योग असतानाच सप्तमेश समजा षष्टात असेल, सप्तमेश निर्बली, पापग्रहांच्या युतीत, दु:स्थानी असेल तर द्विभार्या किंवा वैधव्य योग पुष्प-स्वरुपातही आहे. अशी परिस्थिती असली तरी जसे फूल आले म्हणजे त्याचे फळ होईलच असे नसते, फूल असले म्हणजे फलधारणा होईलच असे निश्चित नसते तद्‌वत अशा परिस्थितीतही द्विभार्या किंवा वैधव्य योग कदाचित येणारही नाही. अंतिम फळ बघण्याच्या दृष्टीने सप्तमस्थानाचा, वैवाहिक जीवनाचा, पत्नीचा कारक ग्रह शुक्र तो कोणत्या राशीत, स्थानात, किती प्रमाणात बलवान किंवा निर्बल आहे ह्यावर अंतिम निकाल अवलंबून आहे. समजा अशा वेळी शुक्र स्वराशीत, केंद्रात, बलवान. शुभग्रह युक्त असेल तर द्विभार्या योग होणारही नाही. पण शुक्र नीचराशीत, पापग्रह युक्त, निर्बल असेल तर द्विभार्या योग होईल- असे भाकीत करण्यास हरकत नाही.

  कारक ग्रहाला अनन्य साधारण महत्त्व आहे. ह्याचे भान ठेवूनच भविष्य वर्तवावे. एखाद्या गुन्ह्याबद्दल खालच्या कोर्टत, हायकोर्टात, सुप्रीम कोर्टात, फाशीची शिक्षा जरी झाली तरी राष्ट्रपति ती कदाचित ज्याप्रमाणे फिरवू शकतो त्याप्रमाणे कारक ग्रहाला महत्त्व आहे. शुक्र-पत्नि कारक, गुरु-संततिकारक, रवि-पितृकारक, मंगळ-भातृकारक, चंद्र- मातृकारक वगैरे ग्रहांचा अत्यंत सखोल अभ्यास करुन प्राचीन ग्रंथकार कशी आश्चर्यकारक भविष्ये वर्तवीत ह्याचा मी अनुभव घेतला आहे.


श्री व. दा. भट यांच्या “असे ग्रह – अशा राशि” मधून साभार.

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