खग्रास चंद्र ग्रहण निर्णय 27 July 2018

आषाढ शुद्ध १५ शुक्रवार दिनांक  27 / 28 जुलै 2018 रोजी खग्रास चंद्र ग्रहण होत आहे, या चंद्र ग्रहणाची  पूर्ण अवधि 3 तास 55 मिनिटे आहे. या ग्रहणाचा 27 जुलै रात्री 11 वाजून 54 मिनटा पासून सुरु होऊन 28 जुलै पहाटे 03 वाजून 49 मिनटा पर्यत पुण्यकाल असेल.

हे चंद्रग्रहण भारत,आस्ट्रेलिया, एशिया, अफ्रीका, यूरोप आणि अंटार्टिका मध्येही असेल.

 

स्पर्शरात्री :- 11 : 54 मिनिटांनी

संमेलनरात्री : 01: 00 वाजता

मध्य रात्री :- 01 : 52 मिनिटांनी

उन्मीलन :- पहाटे 02 : 44 मिनिटांनी

मोक्ष पहाटे :- 03 : 49 मिनिटांनी

पर्वकाल :- 03 : 54 मिनिट

 

वेधारंभ :-  हे ग्रहण रात्रीच्या दुसऱ्या प्रहरात असल्याने तीन प्रहार आधी म्हणजेच  शुक्रवारी 27 जुलै दुपारी 12.45 पासून  ग्रहण मोक्ष होई पर्यंत ग्रहणाचे वेध पाळावेत.  वेधकाळात स्नान , देव पूजा, नित्यकर्मे, जपजाप्य,  श्राध्द ही कर्मे करता येतील. वेधकाळात भोजन निषेध आहे म्हणून अन्नपदार्थ (शिजवलेले अन्न) खाऊ नयेत. मात्र वेधकाळात इतर आवश्यक गोष्टी जसे पाणी पिणे, मलमूत्रोत्सर्ग, झोप ही कर्मे करता येतात. बाल-वृद्ध रोगी व गर्भवती स्त्रिया यांनी सायंकाळी 5:30 पासून वेध पाळावेत.

हे ग्रहण मकर राशीत उत्तराषाढा व  श्रवण या नक्षत्रावर होत आहे. त्यामुळे धनु , मकर व कुंभ राशीच्या व्यक्तींना तसेच पूर्वाषाढा उत्तराषाढा श्रवण व धनिष्ठा ही जन्म नक्षत्र असलेल्या व्यक्तींना विशेष  त्रासदायक आहे.

ग्रहणाचे राशीवर होणारी फल :- मेष, सिंह,वृश्चिक,मिन या राशीनां शुभ फल आहे.

वृषभ,कर्क,कन्या,धनु या राशीनां मिश्र फल आहे.

मिथुन, तुला, मकर, कुंभ या राशीनां अशुभ फल आहे.

 

जन्मराशीपरत्वे ग्रहणफले :-

०१) मेष :- सुखसमृद्धी

०२)वृषभ :- मानभंग

०३) मिथुन :- अरिष्टप्रद 

०४) कर्क :- जोडीदारा त्रासदायक

०५) सिंह :- सौख्यदायक

०६) कन्या:- चिंता वृद्धि

०७) तूळ :- मनस्ताप

०८) वृचिक  :-  लक्ष्मी प्राप्ति

०९) धनु :-  द्रव्यनाश

१०) मकर  :-  शारीरिक पीडा

११)कुंभ   :- आजार

१२) मीन :- द्रव्‍यलाभ

* ज्या राशींना अशुभ फळ आहे त्या राशीच्या व्यक्तींनी व गर्भवती महिलांनी ग्रहण पाहू नये.

ग्रहण पर्व काळातील कृत्ये :- ग्रहण स्पर्श होताच स्नान करावे. पर्व कालामध्ये देवपूजा,  तर्पण,  श्राद्ध,  जप, होम,  दान करावे. पूर्वी घेतलेल्या मंत्रांचे पुरश्चरण चंद्रग्रहणात करावे. ग्रहण मोक्षानंतर  स्नान करावे व शुद्ध चंद्र बिंबाचे दर्शन घ्यावे. ग्रहणपर्वकालामध्ये ( वेधकाळ व पर्वकाळ वेगवेगळा असतो.) झोप, मलमूत्रोत्सर्ग, अभ्यंग, खाणे-पिणे व कामविषयसेवन ही कर्मे करू नयेत. अशौच असता ग्रहण काळात ग्रहांणासंबंधी स्नान दान करण्यापूर्ति  शुध्दी असते.


संदर्भ :- दाते पंचांग सोलापूर,  

 

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स्त्री जातक – कुछ शुभ योग

यदि स्त्री स्वयं अपने पाँवों पर खडी हो तो वह राजयोग के फल का स्वयं उपभोग करती है, यदि पति के अधीन हो तो राजयोगों का लाभ उसके पति को मिलता है और पति के माध्यम से ही वह स्वयं सुख, यश, कीर्ति तथा ऐश्वर्य आदि का उपभोग करती है ।

 

स्त्री की कुण्डली में विभिन्न ग्रह-योगों का प्रभाव निम्नानुसार समझना चाहिए ।

                      

१- यदि सप्तम भाव में शुक्र तथा अन्य शुभ ग्रह हों तो ऐसी स्त्री ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

२- यदि लग्न में चन्द्रमा, दशम भाव में बुध तथा एकादश भाव में सूर्य हो तो ऐसी स्त्री बहुत पुत्र तथा पौत्रों वाली एवं ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

३- यदि लग्न में उच्च का बुध, द्वितीय भाव में शुक्र, दशम भाव में चन्द्रमा तथा एकादश भाव में गुरु हो तो  ऐसी स्त्री समाज में राजपत्नी के समान तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

४- यदि लग्न में गुरु, सप्तम भाव में चन्द्रमा तथा दशम भाव में शुक्र हो तो ऐसी स्त्री नीचकुल में उत्पन्न होने पर भी रानी के समान सुखी तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

५- यदि लग्न में कर्क राशि का गुरु अथवा मीन राशि का शुक्र हो तथा कन्या राशि में बुध एवं सप्तम भाव में उच्चस्थ मंगल हो तो ऐसी स्त्री को अत्यधिक सुख प्राप्त होता है । (मीन राशिका शुक्र हो तो कन्या राशिका बुध होना संभव नही है, लेकिन इस योग का तात्पर्य यह है की गुरु,शुक्र और बुध ये तीनो उच्च के हो। अब बुध और शुक्र दोनो एकसाथ उच्च के नही हो सकते तो एक का नीच भंग हो जाए तो भी उपर बताया गया फल प्राप्त होगा.)

 

६- यदि लग्न में कन्या राशि हो और उसमें बुध, शुक्र की युति हो तथा वृषभ राशि का चन्द्रमा अथवा कर्क या मीन राशि का गुरु हो तो ऐसी स्त्री को राजकन्या की भांति सुख प्राप्त होता है ।

 

७- यदि लग्न में उच्चस्थ बुध तथा एकादश भाव में गुरु हो तो ऐसी स्त्री को राजपत्नी के समान सुख प्राप्त होता है ।

 

८- यदि चतुर्थ भाव में उच्च का चन्द्रमा गुरु से दृष्ट हो तो ऐसी स्त्री देवी के समान श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सौभाग्यशालिनी होती है ।

 

९- यदि सप्तम भाव में कर्क राशि हो तथा सूर्य एवं गुरु की उस पर पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री पुत्र-पौत्रादि के सुख से सपन्न ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

१०- यदि सप्तम भाव में मिथुन, सिंह, कन्या, तुला अथवा कुम्भ राशि का चन्द्रमा हो तथा प्रथम (लग्न) चतुर्थ एव दशम भाव में पापग्रह न हों तो ऐसी स्त्री शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाली, पति द्वारा सम्मानित एवं राजपत्नी के समान ऐश्वर्यशालिनी तथा सुखी होती है ।

 

११- यदि एकादश भाव में चन्द्रमा एवं सप्तम भाव में बुध तथा शुक्र हों और गुरु की उन पर दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री समाज में प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली तथा ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

१२- यदि लग्न, तृतीय, पंचम नवम- इन्हें छोडकर अन्य किसी भी भाव में, राहु के अतिरिक्त, चार शुभग्रह हों तो ऐसी स्त्री समाज में राजपत्नी के समान सन्मान अर्जित करती है ।

 

१३- यदि केन्द्र में कोई राशि शुभ ग्रहों से युक्त हो तथा सप्तम भाव में मेष, मिथुन, कन्या अथवा कुम्भराशि युक्त कोई पापग्रह हो तो ऐसी स्त्री विशेष सुखी एवं ऐश्वर्यशालिनी होती है ।

 

 

१४- यदि सप्तम अथवा अष्टम भाव में शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा उक्त स्थान सुभ से युक्त हों तो ऐसी स्त्री सौभाग्यवती, शीलवती, आचार सम्पन्ना, दीर्घायु, पतिव्रता एवं पति की आज्ञाकारिणी होती है ।

 

१५ –  यदि सप्तम तथा अष्टम भाव में पापग्रह हों, परन्तु नवम भाव शुभग्रहों से युक्त हो तो ऐसी स्त्री पति एवं पुत्र से युक्त तथा सुखी रहती है ।

 

१६- यदि सप्तम भाव में कर्क राशि गत चन्द्रमा हो तथा उसके साथ गुरु भी हो तो ऐसी स्त्री सुन्दरता में साक्षात रति समान होती ।

 

१७-  सप्तम भाव में सम राशि ( वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन) हो और वह शुभ ग्रहों से दृष्ट अथवा युक्त हो तो ऐसी स्त्री पुण्यवान एवं राजमान्य होती है ।

 

१८- यदि सप्तम भाव में मीन का शुक्र हो तो ऐसी स्त्री सुन्दर नेत्रों वाली, उत्तम वस्त्रालंकारों से युक्त तथा संगीत-कला में प्रवीणा होती है ।

 

१९-  यदि सप्तम भाव में बुध तथा चन्द्रमा हों तो ऐसी स्त्री सब कलाओं को जानने वाली, गुणवती तथा सुखी होती है ।

 

२०-  यदि सप्तम भाव में शुक्र और बुध हों तो ऐसी स्त्री अत्यन्त सुन्दरी, सब कलाओं की जानने वाली तथा भाग्यशालिनी होती है ।

 

२१-  यदि सप्तम भाव में शुक्र तथा चन्द्रमा हो तो ऐसी स्त्री सुन्दरी, सुख-सम्पन्ना, परन्तु ईर्ष्यालु-स्वभाव की होती है ।

 

२२-  यदि केवल षडवर्ग में शुक्र केतु में बैठा हो और उस पर चन्द्रमा की दृष्टी हो तो ऐसी स्त्री अत्यन्त सुन्दर, स्थूल नितम्बों वाली, धन-पुत्रादि से सम्पन्न, (सुखी तथा रानी के समान ऐश्वर्य -शालिनी होती है ।

 

२३-  यदि कर्क लग्न का उदय हो, सप्तमभाव में सूर्य हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री अप्सराओं मे प्रधान अथवा रानी के समान सुन्दरी, स्वस्थ, ऐश्वर्यशालिनी तथा पुत्र-पौत्री से युक्त होती है ।

 

२४-  यदि शुभ ग्रह केन्द्र में हों तथा पापग्रह छठे, एवं बारहवें भाव में हों तो ऐसी स्त्री सुन्दर, शान्त स्वभाव वाली, धनवती गुणवती, पुत्रवती, ऐश्वर्यशालिनी तथा रानी के समान होती है ।

 

२५-  यदि षडवर्ग में शुद्ध होकर तीन ग्रह केन्द्र में पडे हों तो ऐसी स्त्री रानी होती है ।

 

२६-  यदि बुध उच्च का होकर लग्न में बैठा हो तथा गुरु एकादश भाव में हो, तो ऐसी स्त्री राज-पत्नी अथवा रानी के समान ऐश्वर्यशालिनी होती है तथा उसकी गणना संसार की प्रसिद्ध स्त्रियों में की जाती है ।

 

२७ – यदि वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर एवं मीन राशि में मंगल, बुध, गुरु तथा शुक्र हों तो ऐसी स्त्री बडी विदुषी, साध्वी, गुणवती तथा पुत्रवती होती है ।


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पंचांग परिचय (हिंदी)

पंचांगातील काही विशेष शब्दांचे स्पष्टीकरण

पंचांग कसे पहावे हे पंचांगाच्या सुरूवातीलाच लिहीलेले असते. पण पंचांगात असे बरेच शब्द असतात ज्यांचा अर्थ अथवा स्पष्टीकरण मात्र पंचांगात दिलेले नसते. ज्योतिष वर्गातसुद्धा पंचांगाच्या भागावर केवळ तोंड ओळख होईल तेवढीच चर्चा केली जाते. त्यामुळे पंचांगातील बऱ्याच शब्दांचे अर्थ बऱ्याच जणांना माहीतच नाहीत असे दिसते. त्यांच्यासाठी म्हणून पंचांगात वापरण्यात येणाऱ्या संज्ञांचे अर्थ देत आहे. याचा नविन अभ्यासकाना उपयोग होईल अशी आशा आहे. पंचांगात येणाऱ्या खालिल शब्दाचे अर्थ व स्पष्टीकरण आपण खालील लिन्कवर वाचू शकाल.

आग्रयण, इष्टि, अन्वाधान, सामुदाय मुहुर्त जसे महर्घ, साम्यार्घ, समर्घ, उत्तरशृंग किंवा दक्षिणशृंग, चंद्रदर्शन, तिथी वासरे, पु.पु.सू.सू., करिदिन, मेषायन, वृषभायन, पुण्यकाल, वेळा अमावास्या, भावुका अमावास्या, पिठोरी अमावास्या, सोमवती आमावस्या, तिथीद्वय व तिथीशून्य, प्रदोष, दर्शेष्टि, दिनमान, उष:काल व अरुणोदय, निशीथकाल,  भद्रा – कल्याणी, दग्ध, यमघंट, मृत्यु, अमृत, युगादि, मन्वादि, कल्पादि इत्यादी.

वरील शब्दांचे स्पष्टीकरण पुढील लिंकवर वाचा ….. पंचांगातील काही विशेष शब्दांचे स्पष्टीकरण

 

 

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स्वर शास्त्र – परिचय (हिंदी)

   भारतीय ऋषि-मुनियों ने लोक-कल्याणार्थ जिन-जिन चमत्कार-पूर्ण शास्त्रों का निर्माण किया है, उनमें ’स्वर-शास्त्र’ प्रमुख है। यह विश्व को भारत की एक अत्यन्त महत्व-पूर्ण देन है। यह विद्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए नित्य उपयोगी है। इसके द्वारा सुख-सौभाग्य , उन्नति व सफलता तथा स्वास्थ और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। अतएव इसका ज्ञान अत्यन्त लाभ-दायक है।

             स्वर+उदय= स्वरोदय। स्वर के नियम-पूर्वक चलाने की विद्या को ’स्वरोदय’ (स्वर-विज्ञान) कहते है। यह अत्यन्त प्राचीन और प्रतिष्ठित विज्ञान है। वर्तमान समय में यह विद्या लुप्त-प्राय ही है, परन्तु जो लोग इससे जरा परिचित हैं,वे इस पर अत्यन्त श्रद्धा रखते हैं क्योंकि इस विद्या का जानकार सदैव सुखी एवं स्वस्थ रहता है और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे सफलता प्राप्त करता है। इस विद्या का अभ्यासी भूत, वर्तमान और भविष्य की बातें भी जान सकता है। ’काल-ज्ञान’ की यह एक अत्यन्त सरल रीति है। इसमें बिना किन्हीं अन्य साधनों के मात्र नासिक पर अँगुली रखकर स्वर की गति से भावी शुभाशुभ का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। शरीर की आरोग्यता में भी यह बहुत उपयोगी है। ’स्वर-विज्ञान’  के द्वारा योगियों ने अनेक चमत्कारों से मानव-समाज को चमत्कृत किया और धर्म से विमुख प्राणियों को धर्म मे दृढ किया लेकिन आज मानव अपने प्रमाद-वश इस ज्ञान से वञ्चित रहकर अन्धे के समान विचरण कर रहा है। ’स्वरोदय’ का स्पष्ट अर्थ है- ’नासिका द्वारा निकलनेवाले पवन (वायु) की गति-विधियों का बोध’। इस शरीर में वायु कब, कैसे और किस प्रकार प्रवेश करती है तथा निकलती है एवं उसका क्या प्रभाव है- यही ज्ञान ’स्वर-विज्ञान’ है।

              स्वरों के अभ्यास से मनुष्य अपनी छिपी हुई अलौकिक शक्तियों का समुचित विकास कर प्रकृति से सामञ्जस्य स्थापित कर सकता है। वस्तुत: इस जगत में वही पूर्ण-रुपेण सफल्ता हो सकता है, जो प्रकृति के अनुकूल चलता है तथा उससे सही सन्तुलन बनाए रखता है क्योंकि प्रकृति से विपरीत चलने पर सफलता सन्दिग्ध हो जाती है। ’स्वर-विज्ञान’ मानव को प्रकृति से जोडने का एक सरल-सहज मार्ग है।

           साधक स्थिर-चित से एकान्त में बैठकर शुभ-पूर्वक गुरु व इष्ट का स्मरण करके नासिक से निकलता हुआ स्वर देखे तथा इस विद्या में वर्णित विधि के अनुसार कार्य करे, तो स्वर की अनुकूलता का उसे लाभ मिलेगा। यह विधा परम पवित्र तथा सर्व-विधि कल्याण करनेवाली है। इससे यह लोक ओर पर-लोक दोनों सुधरते हैं।

 

  स्वर-माहात्म्य

 

             शास्त्रों में ’स्वर-विद्या’ के ज्ञान के महत्व एवं उसके प्रभाव का वर्णन करते हुए यहाँ तक कहा गया है कि स्वरों की अनुकूलता से राम, रावण-जैसे महा-बल-शाली का वध करने मे  ं समर्थ हुए तथा स्वरों की प्रतिकूलता के कारण रावण-जैसे अपराजेय महा-पराक्रमी का पतन हुआ। स्वरों के बल से पाण्डव मात्र पाँच होने पर भी विजयी हुए व स्वरों के विपरीत होने से कौरव सौ होने पर भी मारे गए।

 

  ‘स्वर-शात्र’ की प्रशंसा करते हुए भगवान शिव ने स्वयं कहा है-

 

गुह्याद्‌ गुह्य तरं सारमुपकार-प्रकाशनम्‌।

इदं स्वरोदयं ज्ञानं, ज्ञानानां मस्तके मणि:॥

  गुप्त से भी अत्यन्त गुप्त ऎसे सार (ज्ञान) एवं लाभ (उपकार) को प्रकाशित करनेवाला यह स्वरोदय-ज्ञानों का शिरोमणि है।

 

स्वर-ज्ञानात्‌ परं गुह्यं, स्वर-ज्ञानात्‌ परं धनम्‌ ।

स्वर-ज्ञानात्‌ परं ज्ञानं, न वा दॄष्टं न वा श्रुतम्‌ ॥

 स्वरज्ञान से श्रेष्ठ को गुप्त वस्तु, कोई श्रेष्ठ धन, कोई श्रेष्ठ  ज्ञान न देखा गया है और ना ही सुना गया है।

 

स्वर शास्त्र के ज्ञान से अभीष्ट प्राप्ति।

 

शत्रुं हन्यात्‌ स्वर-बले, तथा मित्र समागम:।

लक्ष्मी-प्राप्ति: स्वर-बले, कीर्ती: स्वर-बले सुखम्‌॥

स्वर के बल से ही शत्रुओं का नाश होता है तथा स्वर के बल से ही मित्र, धन-सम्पत्ति, यश-कीर्ती व सुख की प्राप्ति होती है।

 

कन्या-प्राप्ति: स्वर-बले, स्वरतो राज-दर्शनम्‌ ।

स्वरेण देवता-सिद्धि:, स्वरेण क्षितिपो वश:॥

स्वर के बल से कन्या की प्राप्ति (विवाह) तथा राजा के दर्शन का (सरकरी कामों मे यश) संयोग बनता है। स्वर के ही प्रभाव से देवता प्रसन्न होते है तथा राजा वश मे होता है।

 

स्वर शास्त्र को दोष नहीं है।

 

न तिथिर्न च नक्षत्रं, न वारो ग्रह-देवता:।

न च विष्टि-व्यतिपातो, वैधृत्याद्यास्तथैव च ॥

स्वर शास्त्र में तिथि, नक्षत्र, वार, ग्रह, देवता, विष्टि (भद्रा), व्यतिपात, वैधृति आदि का दोष नही है।

 

कुयोगो नास्त्यतो देवि! भविता वा कदाचन ।

प्राप्ते स्वरबले शुद्धे, सर्वमेव शुभं फलम्‌ ॥

स्वरशास्त्र में कोई कुयोग नही है और न कभी होगा। जब स्वर का शुद्ध बल प्राप्त हो, तब संपुर्ण फल शुभ ही होता है।

 

स्वर-ज्ञान के बिना ज्योतिष-ज्ञान अधूरा

  स्वर-शास्त्र का ज्ञान प्रत्येक ज्योतिषी एवं भविष्य-वक्ता के लिए अत्यावशक है, क्योंकि इसके बिना वह अपने क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता।

  स्वर-हीनश्च दैवज्ञो, नाय-हीनं यथा गृहम।

  शास्त्र-हीनं यथा वक्त्रं, शिरो-हीनं च यद-वपु:।

  स्वर-ज्ञान के बिना ज्योतिषी (दैवज्ञ) उसी प्रकार से अपूर्ण है, जिस प्रकार स्वामी के बिना गृह, शास्त्र के बिना मुख ओर सिर के बिना शरीर अपूर्ण होता है।

 

       वास्तव में स्वर-शास्त्र ज्योतिषोयों के लिए  अत्यन्त उपयोगी है क्योंकि इससे उनके फलादेश में पूर्णता और सूक्ष्मता आएगी।ज्योतिषी का ज्योतिष स्वरोदय-ज्ञान के बिना लॅगडा है। स्वर-ज्ञानी नाक पर हाथ रख नाक के नथुनों मे निकलते हुए स्वास को परख कर समस्त प्रश्नों का सही  उत्तर देकर सबका समाधान करने में समर्थ हो जाता है। लाभालाभ, तेजी-मन्दी, वृष्टी-अनावृष्टि, संयोग-वियोग, मित्रता-शत्रुता, वाद-विवाद में जय-पराजय, वर्ष-फल्म गर्भ में पुत्र-पुत्री, रोगी का जीवन-मरण, परदेश-गमन (यात्रा) में सफलता- असफलता, कार्य की सिध्दि-ससिध्दि आदि नाना प्रकार के प्रश्नों (गुत्थियों) के समाधान में स्वरोदय-ज्ञान एक चमत्कारी विद्या है।


क्रमश:

स्वरशास्त्र का उपयोग दैनंदिन जीवन में कैसे कर सकते है उसके बारे में अगले भाग  में देखेंगे।

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संतान दीपिका- अर्थात संतती योग

हा ‘संतान दीपिका’ नांवाचा एक ग्रंथ आहे, पण यात संतान योगाचे केवळ २८ च श्लोक आहेत. त्यापुढील श्लोक प्रश्नकालीन कुंडलीवरून  आजार साध्य कि असाध्य आहे याबद्दल आहेत तर काही जन्मकालीन कुंडलीवरून व्यक्तीला कोणकोणते आजार होऊ शकतील याबद्दलचे आहे. शत्रूने केलेल्या जारणमारणादी प्रयोगाबद्दलही काही श्लोक आहेत. बाकी सर्व धनादि द्वादश भावविचार बद्दल विवेचन आढळते.

ग्रंथकारांच्या नावाचा कोठेही उल्लेख मिळत नाही. हा ग्रंथ म्हणजे बृहद्जातक, जातक पद्धती, सरावली, पाराशरी व प्रश्न शास्त्रावरील काही ग्रंथ यांचे अवलोकन करून केलेले संकलन  म्हणता येईल. ग्रंथकारही वरील ग्रंथांच्या आधाराने आपण हा ग्रंथ रचला आहे असेच सांगतो. यावरून हा ग्रंथ फार जुना नाही हे लक्षात येते.

( या ग्रंथाची जी प्रत मिळाली ती बरीच अशुद्ध होती तरी त्यातील अशुद्धे जेवढी सुधारता येतील तेवढी सुधारून घेतली आहेत. – भाषांतर कार. )

 

 श्रीगणेश व मोहनीराज यांस नमस्कार करुन गुरुला वंदन, वाग्देवीस नमन व ब्रह्मदेवाचें स्मरण करुन ग्रंथकार ग्रंथारंभ करितात. त्याचप्रमाणें शंकर, भगवान, विष्णु, नवग्रह यांची पूजा करुन वासुदेव गुरुचें ध्यान मी संतानदीपिका सांगतों. ||1-2||

 

 वराहकृत ज्योति:शास्त्र, जातकपद्धति, सारावली, पराशराचे या शास्त्रावरचे ग्रंथ व प्रश्नशास्त्राचे इतर ग्रंथ वारंवार अवलोकन करुन त्या सर्वांतील सार काढून अल्पबुद्धि व अज्ञानी लोकांच्या हितासाठी उपदेश करण्यालायक अशी ही संतानदीपिका सांगतों. ||3-5||

 

 निपुत्रिकत्व, दत्तकपुत्रयोग, एकपुत्रयोग, अपुत्रत्वयोग व अनेक पुत्र होण्याचे योग (अनुक्रमें) सांगतो. ||6||

 

(१)  जन्मकुंडलींत गुरु, व १/५/७ या स्थानांचे स्वामी हे सर्व बलहीन असतील;

(२) पंचमस्थानीं पापग्रह असून पंचमेश नीच असेल व त्याजवर शुभग्रहाची दृष्टी नसेल तर निपुत्रिकत्व सांगावें. ||7-8||

 

(१) अष्टमेश पंचमांत व पंचमेश अष्टमांत शत्रुक्षेत्रीं असून त्यावर शुभग्रहांची दृष्टी नसेल तर किंवा तो नीच असेल तर;

(२) गुरु दोन पापग्रहांच्या मध्यें असेल व पंचमेश निर्बल आणि शुभग्रहानें युक्त अगर दृष्ट नसेल तर;

(३) पंचमस्थानीं शुभग्रह नसून अथवा पंचमावर शुभग्रहांची दृष्टी नसून त्याच्या दोहों बाजूंस पापग्रह असतील व पंचमेश पापग्रहानें युक्त असेल तर; (४) पंचमेश नीच, शत्रुक्षेत्रीं, अस्तंगत असा ६।८।१२ या स्थानच्या स्वामींनीं युक्त आणि पंचमावर व पंचमेशावर शुभग्रहांची दृष्टि नसेल तर संतति नष्ट होते. ||9-12||

 

 गुरु, लग्न व चंद्र यांच्या पचमांत पापग्रह असून त्यावर शुभग्रहांची दृष्टी नसेल तर निपुत्रिकत्व सांगावें. ||13||

 

(१) मिथुन किंवा कन्या राशींत अगर मकर किंवा कुंभ राशित पंचमांत मांदि व शनि असतील किंवा त्यांची त्यावर दृष्टी असेल तर;

(२) पंचमांत पूर्ण बलवान असा शुभग्रह असेल व त्यावर पंचमेशाची दृष्टी नसेल तर दत्तक घेण्याची वेळ येते.  ||14-15||

 

*(औरस संतति होत नाहीं. १४।१५ श्लोकांत दत्तकयोग सांगण्याचा ग्रंथकाराचा आशय दिसतो. पण श्लोकार्थावरुन तो आशय बाजूला राहून जन्मणाराच दत्तक होईल असा अर्थ निघतो पण तो चुकीचा आहे.येथें भावार्थच दिला आहे.)

 

 पंचमांत मकर राशिच्या मध्यभागीं गुरु असेल तर त्यास पुत्रशोक घडतो व तेथें तो कर्क राशींत असेल तर कन्यासंतति पुष्कळ होते. ||16||

 

 पंचमस्थानीं पंचमेश, गुरु, शुक्र व बुध बलवान असतील अगर ते बलवान असे पंचमास पाहत असतील तर पुत्रसंतति पुष्कळ होते. ||17||

 

(१) पंचमेश बलवान असा पंचमांत असेल अथवा पंचमावर त्याचि दृष्टि असेल व पंचमांत पापग्रह नसेल तर;

(२) पंचमांत मंगळ गुरुयुक्त अगर दृष्ट असा मेष, सिंह, वृश्चिक किंवा मीन राशींत असेल तर पुत्रप्राप्ति सांगावी. ||18-19||

 

*(पंचमांत मेष अगर सिंह राशी संतति कमी दर्शवितात व तेथें मंगळ हा संततीस प्रतिबंधक असतो. असें असतांही त्यावर असणाऱ्या एका गुरुच्या दृष्टीवर भिस्त ठेवून ग्रंथकाराने हा योग दिलेला आहे.)

 

 पंचमेश बलवान असा १।५।७ या स्थानीं असून त्यावर पापग्रहाचे दृष्टी नसेल किंवा तो पापग्रहानें युक्त नसेल तर संततिसौख्य मिळेल. ||20||

 

 पंचमस्थान दोन शुभग्रहांच्या मध्यें किंवा शुभग्रहाच्या दृष्टींत असेल व पंचमेशानें तें युक्त अथवा दृष्ट असेल तर पुत्रप्राप्ति होईल. ||21||

 

 बलवान गुरु १।५।७ या स्थानीं असून त्याजवर पापग्रहांची दृष्टि नसेल तर संततीची प्राप्ति होते. ||22||

 

 पंचमेश बलवान, दोन शुभग्रहांमध्ये, अथवा शुभग्रहांनीं युक्त किंवा दृष्ट असेल तर संततिलाभ होतो. ||23||

 

 पंचमेश, गुरु, मंगळ व रवि हे सर्व पुरुषनवमांशी असल्यास पुत्रकन्यादि मिश्र संतति सांगावी असे कित्त्येक मुनि सांगतात. ||24||

 

 पंचमेश परमोच्च, पुरुषनवांशी, शुभग्रहानें दृष्ट असून पंचमांत पापग्रह नसेल किंवा त्याची पंचमावर दृष्टि नसेल तर पुत्रप्राप्ति होते. ||25||

 

 पंचमेश ६।८।१२ या स्थानाव्यतिरिक्त इतर स्थानीं बलवान असून शुभग्रहानें दृष्ट असेल तर पुत्रप्राप्ति जाणावी. ||26||

 

 पंचमांत राहू हा पंचमेश अगर शनि यांनी युक्त असेल व त्यावर शुभग्रहांची दृष्टि नसेल तर पितृशापामुळें संतत्ति नाश पावते. ||27||

 

 चतुर्थस्थानी पापग्रह असून पंचमेश शनियुक्त असेल आणि व्ययस्थानीं पापग्रह असतील तर मातृशापामुळे संततिनाश समजावा. ||28||


*जातक शिरोमणी खंड १ ले उत्तरार्ध – संपादन – गणकभास्कर विष्णू गोपाळ नवाथे

 

**वरील लेख मूळ संस्कृत श्लोकासहित आमच्या ज्योतिष जगत च्या मार्च २०१८ च्या अंकात प्रसिद्ध केला आहे ज्यांना मूळ श्लोकासहित वाचायचे अथवा संग्रह करायचे असेल त्यांनी आमचा ज्योतिष जगत चा मार्च २०१८ चा अंक आमच्या वेबसाईट वरून डाउनलोड करून घ्यावा.

 

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लक्ष्मी कुठे येत (रहात) नाही ?

“लक्ष्मी” म्हणजे धन, चल तसेच अचल संपत्ती. पण श्रीमंती ही केवळ पैशामध्येच मोजली जाते असे नव्हे तर आरोग्य हेही धन म्हणूनच समजले जाते. म्हणुनच म्हटले आहे, “आरोग्यम्‌ धन संपदा”. श्रीमंतीचा उपभोग चांगल्या आरोग्याशिवाय घेता येऊ शकत नाही. म्हणूनच आपल्या शास्त्रात या आरोग्य संपदेलाही बरेच महत्व देण्यात आले आहे. तसेच आरोग्यवान मनुष्याला धन संपत्ती मिळवण्याच्या अधिक संधी उपलब्ध होत असतात. त्यामुळे चांगले आरोग्य राखणे हेही संपत्तीमान होण्याचीच एक पायरी आहे असे आपण समजू शकतो म्हणूनच आपल्या शास्त्रात कसे रहावे व कसे राहु नये यासंबंधीचे काही नियम दिले आहेत. त्यांचे पालन करणारा व्यक्ति नेहमीच आरोग्य संपन्न राहून धन व संपत्तीचा लाभ व उपभोग घेऊ शकेल. आपल्या काही सवयी आपल्या श्रीमंत होण्यात मार्गात अडचणी निर्माण करत असतात. या सवयीमध्ये बदल करुन आपणही धनवान बनू शकू. तर पाहूया अशी कोणती कामे आहेत जी केल्याने “लक्ष्मी” दूर जाते. जी टाळून आपण संपत्तीमान होऊ शकू. संपुर्ण लेख खालील लिंकवर वाचू शकता…. लेख आवडल्या शेअर जरुन करावा..…..

Belgaum Maratha Matrimony

Belgaum Maratha Matrimony

 

मूत्रं पुरीषमुत्सृज्य यस्तत्पश्यति मन्दधी: ।

य: शेते स्निग्धपादेन न यामि तस्य मन्दिरम्‌ ॥

अधौतपादशायी यो नग्न: शेतेऽतिनिद्रित: ।

सन्ध्याशायी दिवाशायी न यामि तस्य मन्दिरम्‌ ॥

मूर्ध्‍इनतैलं पुरो दत्त्वा योऽन्यदङ्गमुपस्पृशेत्‌ ।

ददाति पश्चाद्‌गात्रे वा न यामि तस्य मन्दिरम्‌ ॥

दत्त्वा तैलं मूर्ध्‍इनगात्रे विण्मूत्रं य: समुत्सृजेत्‌ ।

प्रणमेदाहरेत्‌ पुष्पं न यामि तस्य मन्दिरम्‌ ॥

तृणं छिनत्ति नखरैर्नखरैर्विलिखेन्महीम्‌ ।

गात्रे पादे मलं यस्य न यामि तस्य मन्दिरम्‌ ॥

                                                                    -ब्रह्मवैवर्त पुराण

 

जे लोक मलमूत्राचा त्याग करून त्याकडे पाहतात, ओले पाय घेऊन झोपतात, पाय न धूता झोपतात, संपूर्ण नग्न होऊन झोपतात, दिवसा अथवा संध्याकाली झोपतात, डोक्याला तेल लावून तेच तेल शरिराच्या इतर अंगाना लावतात, मस्तक व शरीराला तेल लावून मलमूत्र त्याग करतात किंवा नमस्कार करतात किंवा फुले तोडतात, नखानी गवत तोडतात, नखानी जमिन कोदरतात, ज्यांच्या शरीरावर मळ जमलेली आहे अशा व्यक्तिंच्या घरी लक्ष्मी कधिही येत नाही.

 

प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा च भर्तु: प्रतिकूलवादिनीम्‌ ॥

परस्य वेश्माभिरतामलज्जामेवंविधां तां परिवर्जयामि ।

                                                                                 -महाभारत आनुशासन पर्व

 

ज्या स्त्रिया घरची भांडी कुंडी व इतर साहित्य व्यवस्थित न ठेवता इतरस्त्र पसरुन टाकतात, म्हणजेच घर व्यवस्थित राहील याकडे लक्ष देत नाहीत, कोणतेही काम करताना विचारपूर्वक करत नाहीत, नेहमी पतीशी वाद करतात, पतीच्या बोलण्याला किंमत देत नाहीत, नेहमी दुसऱ्यांच्या घरात जात असतात, मान मर्यादा सोडून निर्लज्जपणे वागतात, त्यांना लक्ष्मी सोडून जाते.

 

 

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम्‌ ।

सुर्योदये ह्यस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्‌ ॥

                                                                                               -गरुड पुराण

 

जो मळलेले वस्त्र धारण करतो, दातांची स्वच्छता ठेवत नाही, अधिक जेवण करतो, कठोर व उर्मठ बोलतो, सुर्योदय व सुर्यास्ताच्या वेळी झोपतो असा व्यक्ति जरी साक्षात विष्णू जरी असेल तरी लक्ष्मी त्याला सोडून जाईल.

 

 

 

दीपशय्यासनच्छाया कार्पासं दन्तधावनम्‌ ।

अजारेणुस्पृशं चैव शक्रस्यापि श्रियं हरेत्‌ ॥

                                                                      -अत्रिसंहिता

 

दिवा, पलंग (खाट) आणि आसन यांची छाया (सावली), कापसाच्या लाकडानी दात घासने आणि बकऱ्यांच्या पायांच्या धूळीचा स्पर्श या गोष्टी इंद्राच्याही लक्ष्मीचा (संपत्तीचा) नाश करतात.

Belgaum Maratha Matrimony Ad2

Belgaum Maratha Matrimony Ad2

 

तृणं छिनत्ति नखरैस्तैर्वा यो विलिखेन्महीम्‌।

निराशो ब्राह्मणो यत्र तद्‌गृहाद्याति मत्प्रिया ॥

सूर्योदये द्विजोभुङक्ते दिवास्वापी च ब्राह्मण: ।

दिवामैथुनकारी च यस्तस्माद्याति मत्प्रिया ॥

स्निग्धपादश्च नग्नो हि य: शेते ज्ञानदुर्बल: ।

शश्वद्धसति वाचालो याति सा तद्‌गृहात्‌ सती ॥

शिरस्नातस्तु तैलेन योऽन्याङ्ग समुपस्पृशेत्‌ ।

स्वाङ्गे च वादयेद्वाद्यं रुष्टा सा याति तद्‌गृहात्‌ ॥

                                                                  -देवी भागवत

 

जो नखाने गवत तोडतो, नखानी जमीन कोदरतो, जो निराशावादी आहे, जो सुर्योदयाच्या वेळी जेवण करतो, जो दिवसा झोपतो, जो दिवसा मैथुन करतो, जो ओल्या पायानी अथवा संपुर्ण नग्न होऊन झोपतो, जो निरंतर व्यर्थ- निरर्थक बडबड करतो, जो डोकीला तेल लाऊन त्याच हातानी शरिराच्या इतर भागांना स्पर्श करतो, जो आपल्या शरिरावर बोटानी ताल वाजवतो अशा व्यक्तिच्या घरातून लक्ष्मी रुसून निघून जाते.

 

 

दिवा कपित्थछायासु रात्रौ दधिशमीषु च।

धात्रीफलेषु सप्तम्याम्‌अलक्ष्मीर्वसते सदा॥

                                                                    -लघुशंखस्मृति

 

दिवसा काथाच्या झाडाच्या सावलीत झोपणे, रात्रीच्या वेळी दही खाणे, कपसाच्या झाडाच्या लाकडाने दात घासणे, सप्तमीच्या दिवशी आवळा खाणे या गोष्टी जेथे घडातात तेथे नेहमी “अलक्ष्मी” (दारिद्र्य) वास करते.


साभार – क्या करें क्या न करें.

हा लेख हि वाचा ………

आरोग्यदायी कोजागिरी पौर्णिमा

गोवत्स द्वादशीवसुबारस

धनत्रयोदशीधनतेरस

त्रिपुरी पौर्णिमाकार्तिक पौर्णिमा


 

हिंदी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे.

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लक्ष्मी कहाँ नहीं आती ?

लक्ष्मी का मतलब है धन, चल एवं अचल संपत्ति। अच्छा स्वस्थ्य भी एक प्रकारसे धन ही कहाँ जा सकता है। अमीरी केवल पैसों से नहीं आकि जा सकती, स्वास्थ्यपूर्ण खुशहाल जीवन ही अमीरी की असली निशानी है। हमारे शास्त्रोंकी माने तो हमारी कुछ आदते हमें आमिर या गरीब बनाने के लिए जिम्मेदार हो सकती है।  तो आइये जानते है मनुष्य की ऐसी कौनसी आदते है जो उनसे लक्ष्मी को दूर कर देती है।  

 

मूत्रं पुरीषमुत्सृज्य यस्तत्पश्यति मन्दधी:

: शेते स्निग्धपादेन यामि तस्य मन्दिरम्

अधौतपादशायी यो नग्न: शेतेऽतिनिद्रित:

सन्ध्याशायी दिवाशायी यामि तस्य मन्दिरम्

मूर्ध्इनतैलं पुरो दत्त्वा योऽन्यदङ्गमुपस्पृशेत्

ददाति पश्चाद्गात्रे वा यामि तस्य मन्दिरम्

दत्त्वा तैलं मूर्ध्इनगात्रे विण्मूत्रं : समुत्सृजेत्

प्रणमेदाहरेत्पुष्पं यामि तस्य मन्दिरम्

तृणं छिनत्ति नखरैर्नखरैर्विलिखेन्महीम्

गात्रे पादे मलं यस्य यामि तस्य मन्दिरम्

                                                                                          -ब्रह्मवैवर्त पुराण

 

जो मल-मुत्रका त्याग करके उस देखता है, गीले पैरों सोता है, बिना पैर धोये सोता है, नग्न होकर सोता है, संध्याकाल तथा दिनमें सोता है, पहले सिरपर तेल लगाकर पीछे उस तेलको अन्य अंगोंपर लगाता है, मस्तक तथा शरीरपर तेल लगाकर मल-मूत्रका त्याग करता है या नमस्कार करता है अथवा पुष्प तोडता है, नखोंसे तृण तोडता है, नखोंसे भूमि कुरेदता है, जिसके शरीर और पैरमें मैल जमी रहती है, उसके घर लक्ष्मी नहीं आती ।

 

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम्

सुर्योदये ह्यस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्

                                                                                                        -गरुड पुराण

 

जो मैले वस्त्र धारण करता है, दाँतोंको स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करता है, कठोर वचन बोलता है और सूर्योदय तथा सूर्यास्तके समय सोता है, वह यदि साक्षात विष्णु भी हो तो उसे भी लक्ष्मी छोड देती है ।

 

दीपशय्यासनच्छाया कार्पासं दन्तधावनम्

अजारेणुस्पृशं चैव शक्रस्यापि श्रियं हरेत्

                                                                                 -अत्रिसंहिता

 

दीपक, शय्या और आसनकी छाया, कपासकी लकडीका दातुन और बकरीकी धूलका स्पर्श इन्द्राकी भी लक्ष्मीको हर लेते हैं ।

 

तृणं छिनत्ति नखरैस्तैर्वा यो विलिखेन्महीम्

निराशो ब्राह्मणो यत्र तद्गृहाद्याति मत्प्रिया

सूर्योदये द्विजोभुङक्ते दिवास्वापी ब्राह्मण:

दिवामैथुनकारी यस्तस्माद्याति मत्प्रिया

स्निग्धपादश्च नग्नो हि : शेते ज्ञानदुर्बल:

शश्वद्धसति वाचालो याति सा तद्गृहात्सती

शिरस्नातस्तु तैलेन योऽन्याङ्ग समुपस्पृशेत्

स्वाङ्गे वादयेद्वाद्यं रुष्टा सा याति तद्गृहात्

                                                                                         -देवी भागवत

 

जो नखोंसे तृण तोडता है, नखोंसे पृथ्वीको कुरेदता है, जो निराशावादी है, सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता और मैथुन करता है, भीगे पैर अथवा नंगा होकर सोता है, निरन्तर व्यर्थकी बातें तथा परिहास करता है, सिरपर तेल लगाकर उसीसे दूसरे अंगका स्पर्श करता है और अपने अंगपर बाजा बजाता है, उसके घरसे रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती है ।

 

 

दिवा कपित्थछायासु रात्रौ दधिशमीषु च।

धात्रीफलेषु सप्तम्याम्अलक्ष्मीर्वसते सदा॥

                                                                                              -लघुशंखस्मृति

 

दिनमें कैथकी छाया, रात्रिमें दही, कपासकी लकडीका दातुन और सप्तमीके दिन आँवला-ये जहाँ पर होता है वहाँ सदैव अलक्ष्मी का वास रहता है।

 

प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा भर्तु: प्रतिकूलवादिनीम्

परस्य वेश्माभिरतामलज्जामेवंविधां तां परिवर्जयामि

                                                                                                                   -महाभारत आनुशासन पर्व

 

जो स्त्रियाँ घरके बर्तनोंको सुव्यवस्थित रुपसे न रखकर इधए-उधर बिखेरे रहती हैं, सोच-समझकर काम नहीं करतीं, सदा अपने पतिके प्रतिकूल ही बोलती हैं, दुसरोंके घरोंमें घूमने-फिरनेमें रूचि रखती हैं और लज्जाको सर्वथा छोड देती हैं, उन्हें लक्ष्मी त्याग देती है ।


 साभारक्या करें, क्या करें ?

मराठीत वाचण्यासाठी येथे क्लिक करा.

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Jyotish Jagat E-Magazine March 2018

नमस्कार,

आम्ही ज्योतिष जगत नावाची इ- मासिकाची सुरुवात केली आहे. आज मार्च २०१८ चा अंक वाचकांच्या पुढे ठेवत आहोत.  अंक सर्वांसाठी मोफत असेल. ज्यांना हवे असेल त्यांनी आमच्या वेबसाईट च्या मधून मोफत करून घेऊ शकता . हे  मासिक ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, वास्तुशास्त्र, अंकशास्त्र, डाऊजिंग, टॅरोट, रेकी, रमल अध्यात्म, धर्म, संस्कृति, आयुर्वेद  इ. व यासारख्या विषयांवर आधारीत आहे.

हा आमचा पहिलाच प्रयत्न असल्याने वाचकांच्या पाठींब्याची व प्रोत्साहनाची गरज लागेलच. हे मासिक अजून चांगले, वाचनीय बनविण्यासाठी जर आपल्याकडेही काही कल्पना असतील अगर काही सुधारणा सुचवायच्या असतील तर आपले स्वागत आहे. जर मासिकात काही त्रुटी राहिल्या असतील तरीही कळवा. प्रतिक्रिया जरूर द्या.

www.jyotishjagat.com वर जाऊन download करून घेऊ शकता.

धन्यवाद

ज्योतिष जगत

नमस्कार ,

ज्योतिष जगत हमारी इ-पत्रिका है। आज मार्च २०१८ का  अंक पाठको के लिए उपलब्ध कर दिया है | जो पाठकोंके लिए मुफ्त (Free) है। कोई भी इसे हमारी वेबसाइट के Download section से Download कर सकता है। यह पत्रिका ज्योतिष (सभी शाखाए), वास्तुशास्त्र, अंकशास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, डाऊजिंग, रमल, टॅरोट, रेकी, अध्यात्म, धर्म, संस्कृती, आयुर्वेद इ. विषयोंपे आधारीत रहेगी।

यह हमारा पहला प्रयास है तो, मासिक पत्रिका को और बेहतर बनाया जा सके इस के लिए अगर आपके पास कोई विचार या योजना है, या आपका कोई सुझाव है तो भी आप का स्वागत है। या फिर अगर कोई त्रुटि रह गयी है तो बता दे। पर प्रतिक्रया अवश्य दे।

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धन्यवाद

ज्योतिष जगत

 

Book Review – बलभद्र विरचितम् -होरा रत्नम

Book Review – बलभद्र विरचितम् -होरा रत्नम

                   होरा रत्नम ज्योतिष के होरा शास्त्र पे रची एक अनुपम रचना है। इसके रचेयता का नाम बलभद्र है जो की कान्यकुब्ज के निवासी थे। होरारत्नम के आलावा बलभद्र ने  “हायन रत्न” नामक ग्रन्थ की भी रचना की है जो वर्षफल पे आधारित है। होरारत्नम ग्रन्थ का रचना काल विक्रम सवन्त १७१० (इ. स. १६५३ ) बताया गया है।  होरा रत्नम की विशेषता ये है की एक अनेक उत्कृष्ट ग्रन्थोंके संकलन से बनी है।  इसे  एक अद्वितीय कोश ग्रन्थ के रूप में संग्रह कर सकते है। इस ग्रन्थ में होरा शास्त्र के सभी विषयोंका पराशर, वराहमिहिर, कल्याण वर्मा (सारावली), यवन इ. के साथ ही नारद, गर्ग, वशिष्ठ, सूर्य, समुद्र, कश्यप इ. (जिनकी कोई भी रचना आज उपलब्ध नहीं है।) महर्षियों के वचनोंका आधार ले कर स्पष्टीकरण दिया गया है। इस महान काय ग्रन्थ में अप्रकाशित ग्रंथों के श्लोक अधिक प्राप्त होते है। इस ग्रन्थ में संज्ञाओं से लेकर योगों तक प्रत्येक बात का निर्णय ग्रन्थान्तरों के वाक्यों से किया है। इससे ग्रंथकार का प्रखर पाण्डित्य द्योतित होता है।

इसमें कुल दस अध्याय है।

          प्रथम अध्याय में इस शास्त्र के पठन पाठन के अधिकारी का निर्णय, भाग्य व पुरुषार्थ का वर्णन, अनेक रीति से राशि व ग्रहों की संज्ञा, स्वरुप व बलाबल विवेचन के अनन्तर उनके फल साथही निषेक (अधान) व जन्म के समय विविध योगों का अनेक ग्रन्थों के आधार पर कथन है ।

          दूसरे अध्याय में जन्म के समय निषिद्ध काल का ज्ञान करके उन अशुभ समयों की अर्थात अभुक्त मूलादि की शान्ति का विस्तृत वर्णन है । इसके बाद होडा चक्र व उसमें अभिजित गणना का विचार, जातकाभरण के आधार पर जन्मपत्री लिखने का क्रम, ६० प्रभवादि संवत्सरों के फल, पंचाग फल जैसे जन्म तिथी-योग आदि का विस्तृत फल कथन, षडवर्ग गणादि के फल तथा डिम्भचक्र का ज्ञान करके उसको फल का जातकाभरण के आधार पर विवेचन है ।

         तीसरे अध्याय में भावों की आवश्यकता व उनका आनयन, भावस्थ ग्रहों का फल, हिल्लाजातकोक्त सावधि भावफल, विशेष फल ज्ञान के लिये संकेत कौमुदी में कथित ग्रह भाव चेष्टाओं का विचार. शयनादि अवस्था का ज्ञान, सप्तम, पंचम, दशम भाव में ग्रहों की अवस्था विशेष का फल, शयनादि अवस्था में सूर्यादि ग्रहों का फल, बारह राशियों में स्थित सूर्यादि ग्रह फल व उन पर ग्रहों के फल का वर्णन है ।

         चौथे अध्याय में राशिस्थ ग्रहों के तथा सूर्यादि ग्रहों के होरादि में हो उनका फल और मित्रादि बल से युक्त व हीन सूर्यादि ग्रहों का फल, मित्र, नीचादि में स्थित ग्रहों के फल का प्रतिपादन है ।

           पाँचवें अध्याय में विविध प्रकार के अरिष्टों का विवेचन व आयु योग, पिता, माता को कष्ट देने वाले योगों का वर्णन, पिता, माता व जातक के अरिष्ट विनाश योग, विविध राजयोग, पंचमहापुरुष योग, छाया व तत्त्वों के फल, पंचमहापुरुष योगों के फल और ग्रहों की रश्मियों का ज्ञान तथा फल का वर्णन है ।

          छठा अध्याय – इसमें नाभस योगों के अतिरिक्त सर्प, किंकर, कृश्यादि शयनी, जांगलादि, नगर व होलादि, चतुश्चक्र व ध्वजोत्तमादि, गृह पुच्छादि, सुख, दरिद्र, रोगोत्पत्ति, कुष्ठ, अंगच्छेद, पक्षाघात, व्रण दोष, मुख दुर्गन्ध तथा व्यापारिक फल विक्रय, वस्त्रविक्रय, अन्नविक्रय, पशुमणिविक्रय, कारुक, ऊर्णादिकर्म, शस्त्रवीणाकाष्ठादि कर्म, चर्मबालकर्म – वस्त्ररंजन-घटकर्म-चित्रादिक-वाद्यवादन-भैषज्यसूतकादि कर्म तथा भिक्षुक योगों का वर्णन है।

          सातवें अध्याय में – बारह भावों के फल का विवेचन है । इसमें विशेषता यह है कि बारह भावों में ग्रहों को १२ प्रकार की स्थिति वश अर्थात उच्च नीचादि में ग्रह के रहने पर जो फल होता है, उसको विचार कश्यप मुनि के वचनों से उपलब्ध है ।

         आठवें अध्याय में – प्रथम १२ राशियों में चन्द्र का तथा चन्द्रमा से बारह भावों में ग्रहों का फल वर्णित है । पुन: सुनफादि योग व उनके फल-सूर्य से केन्द्रादि में चन्द्र फल-वेशिवाशि-उभयचारी योग-प्रवज्या विचार, स-फल अष्टकवर्ग-सर्वतोभद्रचक्र-सूर्यकालानल व चन्द्रकालानल चक्र का फल के साथ विवेचन है ।

           नवें अध्याय में – पिण्डादि आयु चिन्ता, दशारिष्ट विचार-विशेषता के साथ ग्रहों की दशा का फल तथा महादशाफल एवं ग्रहों की प्राणान्त दशा का फल – लग्नादि १२ भावों में २,३,४,५,६,७ ग्रहों की युति का फल उपलब्ध है ।

           दसवें अध्याय में – स्त्रीजातक अर्थात स्त्री जन्मांग के शुभाशुभ योग-त्रिंशांश फल – सातवें भाव में स्वराशी-स्वनवमांश में स्थित सूर्यादि ग्रहों का फल – विविध जातकोक्त योगों का, स-फल डिम्भचक्र-लग्नस्थ राशि फल, नक्षत्र फल, १२ भावों में सूर्यादि ग्रहों के फल और स्त्री कुण्डली में राजयोगों का वर्णन किया गया है ।

           मेरी दृष्टी में यह ग्रन्थ अत्युत्तम प्रतित होता है। क्योंकि इसमें अनेक बातें ऐसी है जो कि अन्य ग्रन्थो में नही है। होरारत्नम्‌, सहि में अनेक जातक के ग्रन्थोंको समझकर बनाया गया यह एक जातक कोश ही है।

 

 इस ग्रन्थ पे डॉ. मुरलीधर चतुर्वेदी जी ने बहोत ही सरल हिंदी व्याख्या की है, साथ ही जगह जगह विशेष टिप्पणीओंके साथ विषयोंको सहज समझाया है। यह ग्रन्थ दो भागो में उपलब्ध है। अगर आप इसे पढ़ना चाहते है तो नीचे दिए लिंक से खरीद सकते है।


 

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होरा रत्नम – प्रथम भाग:

https://www.amazon.in/Horaratnam-Srimanmishra-Balbhadra-Hindi-Vyakhya/dp/8120824474/ref=sr_1_2?ie=UTF8&qid=1520001929&sr=8-2&keywords=horaratnam

होरा रत्नम – द्वितीय भाग:

https://www.amazon.in/Horaratnam-Srimanmishra-Balabhadra-Hindi-Vyakhya/dp/8120824490/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1520001929&sr=8-1&keywords=horaratnam

साप्ताहिक राशिभविष्य 25 फेब्रुवारी ते 03 मार्च 2018

[रविवार २५  फेब्रुवारी ते शनिवार ०३ मार्च २०१८ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट-  या आठवड्यात बुध ०३ मार्च रोजी कुंभ राशीतून मिन राशीत जात आहे., याशिवाय कोणताही ग्रह (चंद्र सोडून ) राशीपालट करीत नाही आहे. ]

 

मेष – अनामिक दडपण जाणवेल. सर्व कृतींवर योग्य नियंत्रण ठेवावे. पोटाचे विकार त्रास देतील. वाहने सांभाळून चालवावीत. मेंदूचे विकार असणा-यांनी काळजी घ्यावी. सरकारी कामात अनुकूलता. व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नोकरीमध्ये चांगल्या घटना घडतील. संततीविषयक संमिश्र परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. शुभ ता. 25/26/03.

 

वृषभ – व्यवसायात आर्थिक नियोजनात बिघाड होईल. नोकरीमध्ये समाधानकारक घटना. संततीच्या वागण्याचा त्रास होईल. विद्यार्थ्यांना प्रयत्नाने यश मिळेल. जोडीदाराबरोबर वादाचे प्रसंग. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. बोलण्यावर नियंत्रण ठेवावे. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. 27/28.

 

मिथुन – व्यावसायिक फारसे चढ-उतार होणार नाहीत. नोकरीमध्ये फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीच्या समस्येतून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना आततायीपणा नुकसानकारक ठरेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. वडिलधा-यांचा सल्ला फायदेशीर ठरेल. तब्येतीच्या तक्रारींकडे दुर्लक्ष करु नये. प्रवास लाभदायक ठरतील. मित्र-मंडळींची साथ लाभेल. शुभ ता. 25/26/01/02.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आर्थिक गोष्टींमुळे तणाव राहतील. नोकरीमध्ये तणाव जाणवेल. सतंतीच्या बाबतीत समस्या उद्भवतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळणार नाही. सरकारी कामात अडचणी येतील. सासुरवाडीमुळे लाभदायक घटना घडतील. प्रवासात अनपेक्षित समस्या येतील. मित्र-मंडळींकडून संमिश्र सहकार्य लाभेल. शुभ ता. 27/28.

 

सिंह –  व्यवसायात आर्थिक समस्या त्रास देतील. नोकरीमध्ये मनाविरुद्ध जबाबदारी येईल. संततीच्या बाबतीत शुभ परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. कौटुंबिक निर्णय विचारपूर्वक घ्यावेत. सरकारी कामात प्रयत्नाने सफलता मिळेल. प्रवासामधून लाभ मिळतील. मित्र-मंडळींबरोबर वादाचे प्रसंग येतील. शुभ ता. 25/26/01/02.

 

कन्या –  व्यावसायिक स्थिति फारशी चांगली राहणार नाही. नोकरीमध्ये सहका-यांची साथ लाभेल. संततीच्या कामात अनपेक्षित अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. भावंडांच्या बाबतीत शुभ घटना घडतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. 25/26/27/28/03.

 

तुला – व्यावसायिक स्थिति चांगली राहील. नोकरीमध्ये फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीच्या विवाहासंबंधी कामे यशस्वी होतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रवासातून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. भावंडांच्या जोडीदाराबरोबर वादाचे प्रसंग येतील. शुभ ता. 27/28/01/02.

 

वृश्चिक –  महत्वाचे निर्णय विचारपूर्वक घ्यावेत. रागाच्या भरात कृती करणे टाळावे. स्थावराच्या संधी चालून येतील. व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नोकरीमध्ये चांगले परिणाम मिळतील. जवळच्या नातलगांपासून त्रास होतील. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. 1/2/3.

 

धनु –  व्यावसायिक आवक चांगली राहील. आर्थिक गुंतवणुकीतून लाभ मिळतील. सरकारी कामात सफलता मिळेल. नोकरीमध्ये नियोजित कामात सफलता मिळेल. संततीच्या कामात अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना अपेक्षित सफलता मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून अपेक्षित सहकार्य मिळेल. जोडीदाराशी वादाचे प्रसंग. शुभ ता. 25/26/3.

 

मकर –  संततीच्या बाबतीत काही समस्या उद्भवतील. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नोकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. सरकारी कामात संमिश्रता राहील. पोटाचे विकारांपासून काळजी घ्यावी लागेल. प्रवासातून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. पण वाद टाळावेत. शुभ ता. 25/26/27/28.

 

कुंभ – नोकरीमध्ये समाधानकारक परिणाम मिळतील. व्यावसायिक प्राप्ती समाधानकारक राहील. संततीच्या विचित्र वागण्यामुळे त्रास होतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. प्रवासामधून व्यत्यय येण्याची शक्यता आहे. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. पचनाच्या विकारांपासून काळजी घ्यावी. शुभ ता. 27/28/1/2.

 

मीन – संततीमुळे खर्चाचे प्रमाण वाढेल. विद्यार्थ्यांचा कल मनोरंजनाकडे राहील. व्यवसायात प्राप्ती समाधानकारक राहील. नोकरीमध्ये मनाविरुद्ध घटना घडतील. सरकारी कामे शक्यतो पुढे ढकलावीत. जोडीदाराच्या वागण्यामुळे मानसिक अस्वस्थता जाणवेल. प्रवासामधून आर्थिक कामात अडचणी येतील. मित्र-मंडळींकडून अपेक्षित सहकार्य लाभेल. शुभ ता. 1/2/3.


सौजन्य – दाते पंचांग

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