राजयोग भंग

हमें अक्सर ये देखने को मिलता है के, कई बार जन्म कुंडली मे अच्छे खासे राजयोग बने रहते है पर इन्सान सामन्य जीवन व्यतीत करता है। क्या राजयोग का कोई अस्तित्व नहीं है ? क्या राजयोग केवल दिखावा है ? तो उत्तर है नही. राजयोग बनने के बाद भी अगर राजयोग मे शामिल ग्रह बलहीन हो तब राजयोग नाममात्र के ही रहते है. हमारे प्राचिन प्रमाणित ग्रंथो में एक अध्याय आता है जो दुर्भाग्य वश जादातर ज्योतिषी बिना पढें ही छोड देते है. ओ है “राजयोगभंगध्याय” यानी कौनसे कारणों से राजयोग भंग हो जाते है। नीचे दिये गये योग श्री पुञ्जराज जी द्वारा लिखित शंभु होराप्रकाश से लिए गये है।

 

जिस व्यक्ती के जन्मकाल में सभी ग्रह शत्रूराशी में अथवा नीच राशी में तथा कोई भी ग्रह वर्गोत्तम ना हो तो उसके राजयोग भंग हो जाते है।

जिसके जन्मकाल में चंद्रमा अथवा लग्नको यदि एक भी ग्रह न देखे तो कथित राजयोग भंग हो जाते है।

जिसके जन्मांग मे स्वांश मे सूर्य तथा क्षीण चंद्रमा पापग्रहसे युक्त, शुभ ग्रहके दृष्टीसे रहीत हो तो वह व्यक्ती पहले राज्य प्राप्त करके बाद मे राज्य से भ्रष्ट होकर दु:ख प्राप्त करता है तथा आशा रहित भी हो जाता है।

केतू के उदय में, व्यतिपात योग में, उल्कापात तथा निर्घात के दिन जिसका जन्म हो वह व्यक्ती यदि राजयोग में भी जन्मा हो तो भी उसका राजयोग नष्ट हो जाता है।

जन्म समय में सूर्य परम नीचांश में हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है, इसी प्रकार गुरु भी राजयोग भंग कर देता है।

जिसके जन्मसमय शुक्र परम निचांश में हो तो व्यक्ती अवश्य ही महत्पदसे च्यूत हो जाता है।

जिसके जन्मसमय कुंभ लग्न हो बृहस्पती अस्तंगत तथा तीन ग्रह नीच राशी में एवं एक भी ग्रह स्वोच्च का न हो, तथा दशम में पापग्रह हों तो राजयोग भंग हो जाता है।

जिसके जन्मसमय शुभ ग्रह अस्तंगत वा नीच में हो अथवा सभी पापग्रह केन्द्र में और शुभग्रह ६-८-१२ में हों तो सभी प्रकारके  भंग हो जाते है।

जिसके जन्मकाल में लग्नमें स्थित राहु चंद्रमा से दृष्ट हो, सूर्य मंगल शनि त्रिषडाय में हो तथा शुभ ग्रह अस्तंगत और केंद्ररहित स्थानो में हों तो सभी राजयोग भंग हो जाते है।

जिसके जन्मसमय में केंद्र में कोई भी ग्रह न हो, शुभ ग्रह अस्तंगत वा नीच राशीयों में हों अथवा चार ग्रह भी शत्रू राशि में हों तो सभी राजयोग नष्ट हो जाते है।


संदर्भ – शंभु होरा प्रकाश: 

 

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नक्षत्र और आराध्य वृक्ष

                   वृक्षों का महत्व तो सभी जानते ही है। वृक्ष निसर्ग की अनमोल देन है।  वृक्षों, वनों, पौधों और पत्तों तक को देव तुल्य मानकर उनकी पूजा की जाती है। देवालयों के परिसर में स्थित वृक्षों को भी देवता मानकर पूजा जाता है। कई वृक्षों को तो सीधे महत्वपूर्ण देवता मानकर उनकी पूजा होती है। ज्योतिष शास्त्र में  सत्ताईस (२७) नक्षत्र बताए गए है, और प्रत्येक नक्षत्र के लिए आराध्य वृक्ष निर्धारित किए गए है।

               प्रत्येक व्यक्ति पर इन नवग्रहों एवं  नक्षत्रों का प्रभाव पढ़ना तय हैI जिस प्रकार ग्रहों एवं नक्षत्रों के देवता के मंत्र,यन्त्र ,रत्न एवं रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार इनके आराध्य  वृक्ष भी होते है। इसी वजह से ज्योतिष शास्त्र में वृक्ष की पूजा का विधान है यदि कोई जातक बहुत परेशानी में है चाहे नौकरी – व्यापार से सम्बंधित, धनसंबंधित,  संतान या  दाम्पत्य जीवन से संबंधित हो, तो उस परेशानी को दूर करने के लिए नक्षत्र के आराध्य वृक्ष की पूजा एक आसान एवं प्रभावी उपाय हो सकता है। अपितु पूजा-अर्चना के पीछे का उदेश्य भी इनका सरंक्षण ही है ।
नक्षत्र और उनके आराध्य वृक्ष के प्रचिलित नामों के वैज्ञानिक नाम भी साथ में दिए गए है। 

{1} अश्विनी———कुपिलु/कुचला-Strycnous nuxvomica
{2} भरणी———–आमलकी/आंवला-phyllanthus embilica
{3} कृतिका———गूलर -Ficus glomerata 
{4} रोहिणी ——जामुन-Syzygium cumini
{5} मृगशिरा —— खदिर/खैर-Acacia catechu
{6} आर्द्रा————–शीशम-Dalbergia sisso
{7} पुनर्वसु ——–वंश/बांस-bamboo
{8} पुष्य ———-पीपल-Ficus religiosa
{9} आश्लेषा ——-नागकेसर-Mesua ferrea
{10} मघा————-बरगद-Ficus bengalensis
{11} पुर्वा फाल्गुनी—पलाश/ढ़ाक-butea monosperma
{12} उत्तरी फाल्गुनी-प्लक्ष/पाकड़-Ficus lacor
{13} हस्त ——-रीठा/Sapindus mukorossi
{14} चित्रा———-बिल्व/वेळ-Aegle marmelos
{15} स्वाती ——अर्जुन-Terminalia arjuna
{16} विशाखा —-विकंकत/कटाई-Flacourtia indica
{17} अनुराधा —–बकुल/मौलश्री-Mimusops elengi
{18} ज्येष्ठा———-शाल्मली/सेमल-Bombax ceiba
[19} मूल ——–शाल-Shorea robusta
{20} पूर्वाषाढ——–वेतस/Salix caprea
{21} उत्तराषाढा —-कटहल/Artocarpus heterophyllus
{22} श्रवण ——-अर्क/मदार-Calotropis procera
{23} धनिष्ठा———-शमी-Procopis ceneria
{24} शतभिषा —–कदम्ब-Anthocephlous cadamba
{25} पूर्वा भाद्रपद –आम-Mangifera indica
{26}  उत्तरा भाद्रपद –नीम-Azadiracta indica
{27} रेवती —-महुआ-Madhuca longifoli

अपने-अपने जन्म नक्षत्र अनुसार पौधा अवश्य लगाये। और उसकी पूजा अर्चना जरूर करे। यह बहुतही सरल एवं प्रभावी तथा बिनखर्चीला उपाय है अपनी परेशानियाँ दूर करने का। 


 – ज्योतिष जगत द्वारा संकलित.

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सूर्यावरील डाग – सौर डाग

  [बृहद संहितेत वराहमिहिराने सूर्यावरील डागांचे वर्णन आहे. हे डाग विशिष्ट कालावधीत विशिष्ठ काळासाठी दिसतात असे त्यांचे मत आहे. जातक शास्त्रात याचा फलादेशासाठी फारसा उपयोग होतो असे दिसत नाही. पण मेदनिय ज्योतिषात खास  करून हवामानाविषयी फलादेश करताना याचा विचार केल्यास अचूकता साधता येते असे दिसते.  आधुनिक शास्त्रज्ञ व हवामान विशेतज्ञ याचा विचार करतात असे आढळते.]

 

 दुर्बिणीने सुर्यावर अनेक काळे डाग दिसतात. एखादा डाग इतका मोठा असतो की, तो नुसत्या डोळ्यांनीही दिसतो. या डागांचे ज्ञान पूर्वीच्या ज्योतिष्यास असावे असे खात्रीने वाटते. बृहत्सांहितेत सूर्याला पर्वणि ग्रहण लागते असे वर्णन आहे ते असे-

   सतमस्कं पर्वविना त्वष्टा नामार्कमण्डलं कुरुते ॥

   स निहन्ति सप्तभूपान्‌ जनांश्च शस्त्राग्निदुर्भिक्षै: ॥

 

      त्वष्टा नामक ग्रह पर्व दिवसावाचुन अन्य दिवशी जेव्हा सूर्यमंडल अंधकरयुक्त करितो, तेव्हा (नक्षत्रकूर्माध्यायात सांगितलेले) सात राजे मरण पावतात. त्याचप्रमाणे शस्त्र, अग्नि व दुष्काळ यांच्या योगाने लोकांचाही नाश होतो.

   हा त्वष्टा नामक ग्रह कोण असवा बरे? हा ग्रह सूर्यबिंब आच्छादन करितो असे यात वर्णन आहे. पर्वकाली म्हणजे पौर्णिमा व अमावास्या या दिवशी ग्रहणकाली जशा प्रकारची चंद्रसूर्याची बिंबे काळी होतात तशीच हा ग्रह सूर्याच्या व चंद्राच्या आढ आला असता काळी होतात असे पराशराचे आहे. तो म्हणतो-

    अपर्वणि शशांकाकौं त्वष्टा नाम महाग्रह: ॥

    आवृणोति तम: श्याम: सर्वलोकविपत्तये ॥

  सुर्यावरील डागाचे हे वर्णन म्हणावे तर चंद्रालाही तो ग्रह ग्रहण करितो असे पराशर म्हणतो. परंतु वराह फक्त सूर्यालाच तो आच्छादितो असे म्हणतो. यावरुन हे वर्णन डागाचे असू शकेल.

तामसकीलकसंज्ञा राहुसुता: केतवस्त्रयस्त्रिंशत्‌ ॥

वर्णस्थानाकरैस्तान दृष्टार्के फलं ब्रूयात ॥

  तामसकीलक नावाचे राहूपुत्र धूमकेतु ३३ आहेत. ते सूर्याच्या आड येतात त्यावेळी त्याच्या बिंबावर उमटलेला रंग, त्या बिंबावरील जागा आणि त्यांचा दिसणारा आकार हे अवलोकन करुन फले सांगावी असे वराहमिहिर म्हणतो.

  परंतु पुढे तो हे डाग चंद्रावरही दिसतात असे दर्शवितो.

ते चार्कमंडलगता: पापफलाश्चन्द्रमंडले सौम्या: ॥

ध्वांक्षकबन्धप्रहरणरूपा पाप: शशांकेऽपि ॥

      त्या तामस कीलक केतूंनी सूर्यबिंब आच्छादिले तर अनिष्ट फल प्राप्त होते व चंद्रबिंब आच्छादिले तर शुभ फल प्राप्त होते. त्यांचा कावळा, मुंडके, खड्‌ग, शस्त्र वगैरे आकार चंद्रामंडलावर दिसला तर मात्र अनिष्ट फल मिळते. सुर्य मंडलावर कसेही दिसले तरी अशुभच असतात.

 ही वर्णने सुर्यावरील डागांचीच असावी. चंद्रमंडल या डागांनी किंवा दुसऱ्या कशाने काळे झालेले अद्यापि कोणाच्या पाहण्यात नाही. ती वराहादिकांची कल्पना असावी. अलीकडील शोधांवरुन सर्व डागांची आकृति सारखी नसते, काही डाग काही दिवस दिसून नाहीसे आणि काहीतर काही महिने दिसत असतात, काही डागांचे क्षेत्रफळ कोट्यावधि मैल असते, डागांचा मध्यभाग फार काळा दिसतो आणि भोवताली काळसर जागा दिसते. हे डाग एखाद्या वर्षी फार दिसतात, एखाद्या वर्षी थोडेच दिसतात, वर्षात मुळीच डाग दिसला नाही असे कधीच होत नाही, एकदा डाग फार दिसले तर पुन: सुमारे ११ व. ३ म. इतक्या काळाने फार दिसतात असे समजले आहे. हे वर्णन व वराहाचे वर्णन यात पुष्कळ साम्य आहे.

  सूर्याच्या डागांच्या कालचक्रास अनुसरुन धान्यादिकांचे भाव कमी जास्त होतात. डाग कमी दिसतात तेव्हा सूर्यकिरण पिकास अनुकूल असतात असे हर्शलचे मत होते. कै. केरोपंत छत्रे यांनी याबद्दल पुष्कळ विचार केला होता, असे दीक्षित लिहितात. पावसाशी व दुष्काळाशी डागांचा संबंध आहे असे त्यांचे अनुमान आहे. मद्रास तेथील वेधाशाळेचे मुख्य अधीकारी पागसन यांचे मत आसे होते की डागांप्रमाणे कर्नाटकाच्या पावसात फरक पडतो असे दीक्षीतांनी लिहीले आहे.

     सूर्य याच कारणाने पापग्रह आहे. जेव्हा असे मोठाले डाग दिसत असतील त्या वेळी जन्मणाऱ्यावर त्यांचा अनिष्ट परिणाम घडत असेल. यासाठी हे ज्ञान ज्योतिष्याला अवश्यमेव संपादन केले पाहिजे व त्यासाठी एक वेधशाळाही पाहिजे. याचकरीता सुर्य शुभ आहे व अशुभही आहे.


कै. श्री विष्णू गोपाळ नवाथे यांच्या “सुलभ जातक -५” मधून साभार .

ग्रह बलनिरुपण

                    कुंडली में ग्रहोंका बल जाननेके अनेक प्रकार या विधा बताए गए है। अष्टकवर्ग, विंशोपिका बल, वर्ग बल इ. प्रकार से ग्रहोंके बल जाने जा सकते है।  इन सभी प्रकारके बल जाननेके लिए ज्योतिष  गणित का अच्छा अभ्यास होना जरुरी है। इन तरिकोंके आलावा भी ज्योतिष शास्त्र में ग्रहोंके बल जाननेके कुछ सरल नियम बताए गए  है।  ये नियम मूलभूत, मौलिक और महत्वपूर्ण है। इन नियमोंके जरिए बिना ज्यादा गणित किए काफी सरलतासे ये जान सकते है की, कोनसा ग्रह कब बलवान होता है और कब बलहीन होता है। यँहा पर ये स्पष्ट कर दू की, ग्रह बलवान या बलहीन होना अलग बात है और ग्रह शुभ या अशुभ होना अलग बात है। इस लेख में ग्रहोंके बल पर विचार किया गया है , शुभाशुभत्व पर नहीं। निचे दिए गए नियम पृथुयश विरचित “होरसार” ग्रंथ से लिए गए है।

          सूर्य- 

                      उत्तरायण में, अपनी राशि, नवांश, द्रेष्काण तथा होरा आदि में बलवान होता है। सूर्य दिवा बली मित्र राशि में होने के कारण मध्यम बली हो जाता है । सूर्य रविवार को और अपनी उच्च राशि में होने पर भी बलवान होता है । राशि के उदय में पूर्ण बली, मध्यम अंश में मध्यम मध्यम बली और अन्तिम अंशों पर होने से सूर्य बलहीन हो जाता है । सूर्य अपनी गति एवम्‌ अंशानुसार बलहीन तथा अस्त भी होता है।

           चम्द्रमा-

                        वृष राशि में होने पर बलवान होता है । चन्द्रमा दक्षिणायन में, अपनी राशि में होने पर, अपने होरा, द्रेष्काण और सोमवार को भी चन्द्रमा बलवान होता है । शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से लेकर दशमी तक मध्यम बली, शुक्ल एकादशी से लेकर कृष्ण पंचमी तक पूर्ण बली और षष्ठी से लेकर अमावस्या तक यह बलहीन हो जाता है । जब चन्दमा उत्तर में रहे और घडी के गति से चले या वह किसी ग्रह के साथ रहे या उससे दृष्ट हो तो यह बलवान हो जाता है । चन्द्रमा राशि के प्रारम्भ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक मध्यम बली और २१ से ३० अंश तक पूर्ण बली हो जाता है। 

            मंगल-

                     दक्षिणायन के राशि में, रात्रि में, मकर-कुम्भ और मीन राशि में होने पर, युद्धरत होने पर तथा तीव्र गति में होने पर बलवान होता है । मंगल अपनी उच्चराशि में, स्वक्षेत्री होने पर, स्वाराशिस्थ होने पर और अपने द्रेष्काण में रहने पर भी बलवान होता है । जब मंगल दसवें भाव में अपनी राशि का रहता है या  अन्य किसी भी राशि में रहता है तब वह बलवान हो जाता है । मंगल राशि के प्रारम्भ में १ से १० अंशों तक पूर्ण बली, ११ से २० अंश तक कमजोर और २१ से ३० अंश तक मध्यम बली हो जाता है ।  

             बुध-

                            सूर्य से १० अंश की दूरी पर रहने से बलवान हो जाता है । बुध अपनी राशि, नवांश, अपने द्रेष्काण में, उत्तरायण में, दिन और रात्रि में बलवान हो जाता है । बुध वक्री गती में होने पर भी बलवान हो जाता है । राशि के प्रारम्भ से १० अंश तक मध्यम बली, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली तथा २१ से ३० अंश तक बुध बलहीन हो जाता है । मिथुन राशि का भी बुध यदि अपने द्रेष्काण मे रहे तो बलवान हो जात है ।   

             बृहस्पति-

                                अपनी राशि मे, कर्क या वृश्चिक राशि में, उत्तरायण में, दोपहर में, अपने द्रेष्काण तथा नवांश में भी बलवान हो जाता है । बृहस्पति किसी भी ग्रह के साथ विजयी मुद्रा में रहने पर भी बलवान हो जाता है । बृहस्पति १ से १० अंश तक मध्यम बली, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली तथा २१ से ३० अंश तक बलहीन हो जाता है। 

           शुक्र-

                   तीसरे, छठे और बारहवें भाव में होने पर, सूर्य से आगे होने पर , दोपहर में और वक्री होने पर भी बलवान हो जाता है । शुक्र अपनी राशि में उच्च राशि का होकर उत्तरायण में होने से बलवान हो जाता है । शुक्र राशि के प्रारम्भ के १ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक पूर्ण बली और २१ से ३० अंश तक मध्यम बली होता है । शुक्र, चन्द्रामा के साथ होने पर और ग्रहों के साथ विजयी मुद्रा में होने पर भी बलवान हो जाता है ।

           शनि-

                            कृष्ण्पक्ष मे, रात्रि में, वक्री होने पर, अपनी राशी में, उच्च राशि तुला में होने पर, दक्षिणायन में और रात्रि में उदय के समय में बलवान होता है । शनि लग्न में बैठकर किसी भी धीमी गति वाले ग्रहों के साथ बैठकर और विजयी मुद्रा में होने पर भी बलवान हो जाता है । शनि राशी के प्रारम्भ के १ से १० अंश तक बलहीन, ११ से २० अंश तक मध्यम बली और २१ से ३० अंश तक पूर्ण बली हो जाता है । अन्य आचार्यों का मत है कि शनि हमेशा बलवान होता है। 

            राहु-

                   मेष, वृष, कर्क, वृश्चिक और कुम्भ राशि का होने पर बलवान होता है । राहु मेष, और चन्द्रामा के साथ होने पर तथा राशि की समाप्ति में सूर्य और चन्द्रामा की परिधि में होने पर बलवान होता है। 

            केतु-

                  धनु राशि के उत्तरार्द्ध में ,मीन, कन्या और वृश्चिक राशि में तथा कन्या राशि में भी बलवान होता है। केतु राशि के प्रारम्भ में तथा इन्द्रधनुष के उदय के समय में भी बलवान होता है। 

             शुभ ग्रह यदि बलवान होता है तो वह व्यक्ति को निश्चय ही भाग्यशाली, ज्ञानी, सुन्दर तथा सम्पन्न बनता है तो दूसरी तरह पापग्रह बलवान होकर के व्यक्ति को मूर्ख, अज्ञनी तथा भाग्यहीन बनाता है एवम्‌ अपने अनुरुप फल देता है। 

 

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सन्दर्भ  – होरासार

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Uttam Gawade

श्री उत्तम गावडे

ज्यो. विशारद, वास्तु विशारद

 9901287974, 8722745745

 

साप्ताहिक राशिभविष्य 26 नोव्हेंबर ते 02 डिसेंबर2017

[रविवार २६ नोव्हेंबर २०१७ ते शनिवार   ०२ डिसेंबर २०१७ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट- शुक्र २५ नोव्हेंबर रोजी  राशीतून तुला  वृश्चिक राशीत तर  मंगळ – २९ नोव्हेंबर रोजी  कन्या राशीतून तुला राशीत जात आहे. या आठवड्यात मंगळ व शुक्र ग्रहा व्यतिरिक्त (चंद्र सोडून ) इतर कोणताही ग्रह राशीपालट करीत नाही आहे.]

 

मेष – व्यावसायिक प्राप्तीत वाढ होईल. नौकरदारांना फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीला वाहन खरेदीचे योग येतील. विद्यार्थ्यांना आत्मविश्वास थोडा कमी राहील. जोडीदाराबरोबर किरकोळ वाद होतील. सरकारी कामात विलंब निर्माण होईल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

वृषभ – उद्योग-व्यवसायात आवक कमी राहील. नौकरीमध्ये संमिश्र परिणाम मिळतील. संततीच्या नित्य कामात बाधा येणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना परिश्रमाने यश मिळेल. सरकारी कामात दिरंगाई निर्माण होतील. जोडीदाराच्या हटवादी वागण्याचा त्रास होईल. कफाच्या विकारांपासून काळजी घ्यावी. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. शुभ ता. २६, २७, २८, २९.

 

मिथुन – व्यावसायिक आवक चांगली राहील, परंतु आर्थिक निर्णय विचारपूर्वक घ्यावेत. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ चांगली मिळेल. संततीच्या प्रश्नांमधून योग्य मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. सरकारी कामास अनुकूलता राहील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. प्रवास संमिश्र फळे देतील. शुभ ता. २८, २९, ३०, १, २.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये फारसे बदल जाणवणार नाहीत. संततीमुळे खर्चाचे प्रमाण वाढते राहील. विद्यार्थ्यांना कष्टाने सफलता मिळेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. स्थावराच्या संधी चालून येतील. वडिलांबरोबर वादाचे प्रसंग येतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १, २.

 

सिंह –  संततीच्या कामात अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना कष्टसाध्य यश मिळेल. कौटुंबिक अडचणीतून मार्ग निघतील. व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये नियोजित कामे यशस्वी होतील. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

कन्या –  व्यवसायात आर्थिक निर्णय लाभ देतील. नौकरीमध्ये नियोजित कामात यश मिळेल. कौटुंबिक वातावरण संमिश्र राहील. सरकारी कामासाठी अनुकूलता राहील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. संततीच्या प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. शुभ ता. २६, २७, २८, २९.

 

तुला – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. कौटुंबिक बाबतीत वडिलधाऱ्यांचा सल्ला लाभ देईल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. संततीच्या नौकरीविषयक प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रवास लाभ देतील. मित्र-मंडळींच्या ओळखीचा फायदा होईल. शुभ ता. २८, २९, ३०, १, २.

 

वृश्चिक – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. अचूक आर्थिक अंदाजामुळे फायदा होईल. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. रागांवर नियंत्रण ठेवावे लागेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. पोटाचे विकारांपासून काळजी घ्यावी. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १, २.

 

धनु –  उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध तडजोड करावी लागेल. संततीच्या कामात अडथळे येतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामात अडचणी येतील. अनावश्यक खर्चावर नियंत्रण ठेवावे लागेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २६, २७.

 

 

मकर –  व्यावसायिक आवक वाढेल. नौकरदारांना समाधानकारक परिणाम मिळतील. संततीच्या कामात दिरंगाई निर्माण होईल. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. सरकारी कामे यशस्वी होतील. अनपेक्षित खर्चाचे प्रसंग येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २८, २९, ३०.

 

कुंभ –  उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ मिळेल. संततीच्या बाबतीत शुभ परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश लाभेल. सरकारी कामातून यश मिळेल. वडिलधाऱ्यांचा सल्ला हितकारक ठरेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २६, २७.

 

मीन – संततीच्या बाबतीत फारसे बदल जाणवणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. वाहनांच्या वेगांवर योग्य नियंत्रण ठेवावे. शुभ ता. २८, २९, ३०.


सौजन्य – दाते पंचांग

साप्ताहिक राशिभविष्य 19 -25 नोव्हेंबर 2017

[ रविवार १९ नोव्हेंबर २०१७ ते शनिवार  २५ नोव्हेंबर २०१७ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट- बुध – २४ नोव्हेंबर रोजी वृश्चिक राशीतून धनु राशीत जात आहे. या आठवड्यात बुध ग्रहा व्यतिरिक्त (चंद्र सोडून ) इतर कोणताही ग्रह राशीपालट करीत नाही आहे.]

 

मेष – व्यावसायिक स्थिति ठीक राहील. नौकरीमध्ये बेफिकिर राहू नये. संततीच्या कामात दिरंगाई निर्माण होईल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. आर्थिक बाबतीत सावध रहावे लागेल. सरकारी कामात अडचणी निर्माण होतील. जोडीदाराबरोबर गैरसमजातून वाद होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. प्रवास लाभ देतील. शुभ ता. २४, २५.

 

वृषभ – उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये सहकाऱ्यांशी आर्थिक कारणावरुन वाद होतील. सरकारी कामात प्रयत्नास यश मिळेल. आर्थिक प्रलोभनांपासून दूर रहावे. संततीच्या कार्यात यश मिळेल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. खाणे-पिणे सांभाळावे. शुभ ता. १९, २०.

 

मिथुन – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये नियोजित कामात यश मिळेल. संततीच्या आर्थिक गोष्टी तपासून पहाव्यात. विद्यार्थ्यांनी वाईट संगतीपासून लांब रहावे. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. आर्थिक जोखीम पत्करु नये. स्थावराचे कामात यश मिळेल. प्रवासामधून कामे होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १९, २०, २१, २२.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. परंतु महत्वाचे आर्थिक व्यवहार शक्यतो टाळावेत. संततीच्या बाबतीत समाधान देणाऱ्या घटना घडतील. विद्यार्थ्यांना संमिश्र यश मिळेल. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. आर्थिक नुकसानीचे प्रसंग येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २१, २२, २३, २४, २५.

सिंह –  व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये अतिरिक्त जबाबदारीचे योग येतील. संततीच्या बाबतीत शुभ घटना घडतील. भावंडांशी आर्थिक व्यवहार टाळावेत. सरकारी कामात व्यत्यय निर्माण होतील. अनपेक्षित खर्चामुळे मेळ बसविणे कठीण जाईल. प्रवासात मौल्यवान वस्तू जपाव्यात. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २४, २५.

 

कन्या –  संततीच्या कामात व्यत्यय येतील. कुटुंबात आर्थिक बाबींबाबत संभ्रमावस्था निर्माण होईल. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये विसंबून राहून कामे करणे टाळावे. सरकारी कामात सफलता मिळेल. आर्थिक बाबतीत पारदर्शी रहावे. अविचारी कृती टाळावी. मित्रांकडून चांगले सहकार्य मिळेल. प्रवास लाभ देतील. शुभ ता. १९, २०.

 

तुला – व्यावसायिक स्थिति चांगली राहील. नौकरीमध्ये जबाबदारीत वाढ होईल. संततीच्या बाबतीत फारसे बदल जाणवणार नाहीत. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. प्रलोभनांपासून दूर रहावे. सरकारी कामात संमिश्र सफलता मिळेल. प्रवास फायदेशीर ठरतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २१, २२, २३.

 

वृश्चिक – संततीच्या बाबतीत आर्थिक नुकसानीचे प्रसंग येतील. विद्यार्थ्यांना सहज यश मिळणार नाही. उद्योग-व्यवसायात प्रलोभनाला बळी पडून जोखीम घेऊ नये. नौकरीमध्ये आर्थिक अमिषाला बळी पडू नये. सरकारी कामात प्रयत्नाने यश मिळेल. प्रवास फायदेशीर ठरतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १९, २०, २४, २५.

 

धनु –  व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध घटना घडतील. विवाहीत संततीच्या जीवनात त्रास होतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता मिळेल. सरकारी कामात व्यत्यय येतील. मोठ्या भावंडांबरोबर आर्थिक कारणांवरुन वाद होतील. प्रवासामधुन कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. २१, २२, २३.

 

मकर –  उद्योग-व्यवसायात प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये वरिष्ठांची साथ चांगली मिळेल. संततीच्या आर्थिक बाबींवर लक्ष ठेवावे. विद्यार्थ्यांना परिश्रमाने यश मिळेल. सरकारी कामे मार्गी लावता येतील. व्यावसायिक आर्थिक निर्णय घाईने घेऊ नयेत. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १९, २०, २४, २५.

 

कुंभ –  व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये कामाचे दडपण सतत वाढते राहील. संततीच्या बाबतीत चांगले परिणाम मिळतील. शेजाऱ्यांच्या भानगडीत पडू नये. सरकारी कामात अनुकूलता राहील. प्रवासातून कामे सफलता दर्शवितात. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १९, २०, २१, २२, २३.

 

मीन – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये प्रलोभनांपासून दूर रहावे. सरकारी कामासाठी अनुकूलता राहील. वडिलधाऱ्यांचा विरोध सहन करावा लागेल. संततीच्या कामात अडचणी येतील. विद्यार्थ्यांना अपेक्षित यश मिळणार नाही. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. २१, २२, २३, २४, २५.


सौजन्य – दाते पंचांग

कारक ग्रहाचे महत्व

                              फलज्योतिषशास्त्रातील काही सिद्धांत व नियम हे ज्या प्रमाणात महत्त्व देऊन अभ्यास करावयास पाहिजेत. त्या प्रमाणात अभ्यासले जात नाहीत. अनेक नियम नुसते वाचले जातात. डोळ्याखालून जातात, ज्योतिषांच्या तोंडी असतात पण कुंडली पाहताना त्याचा वापर, उपयोग कसा करता येईल, ह्याचे चिंतन केले जात नाही किंवा तशी अनूभूति अनेकांना आलेली नसते.

                    पंडित ज्योतिषी व अनुभव सिद्ध ज्योतिषी ह्यातील फरक मी स्वत: उत्तम अनुभवलेला आहे. आमच्या अगोदरच्या पिढीत एक ज्योतिषी अत्यंत मोठे पंडित होते. फलजोतिषशास्त्रावर भाषणेही उत्तम द्यावयाचे. दुसरे एक ज्योतिषी तसे फार न शिकलेले, भाषणबाजी फारशी न करता येणारे. पहिल्या ज्योतिषांचे पुस्तकी ज्ञान पुस्तकांत राहवयाचे पण दुसरे ज्योतिषी प्रत्यक्ष कुंडली पाहताना अचूक मर्म ओळखावयाचे व अचूक भविष्य सांगायचे, सांगावयाचे कारण ज्योतिषतत्त्वांचा अचूक वापर करता येणे महत्त्वाचे आहे.

                     निर्णायक घटक ठरवण्याच्या दृष्टीने सर्व सूत्रात मला जास्त अनुभवास आलेले सुत्र म्हणजे

  भावात भावपतेश्व कारकवशात फल योजयेत ।

                 कुंडलीवरुन जीवनातील कोणत्याहि गोष्टीचा अभ्यास, विचार करताना, त्या गोष्टीबद्दल भाकीत करताना तीन गोष्टींचा प्रामुख्याने विचार करावा लागतो. साकल्याने सारासार अभ्यासाने ज्या तीन गोष्टींकडे लक्ष द्यावे लागते. त्या तीन गोष्टी म्हणजे-

१) संबंधित गोष्टी संबंधी जे स्थान, जो भाव कुंडलीत असतो त्या स्थानाचा अभ्यास- त्या स्थानातील राशि, ग्रह वगैरे. (संबंधित गोष्टीसंबंधित भाव)

२) त्या स्थानाचा-भावाचा अधिपति-भावेश हा दुसरा महत्त्वाचा ग्रह. (संबंधित गोष्टीसंबंधित भावेश)

३) त्या गोष्टी संबंधी, त्या स्थाना संबंधीचा कारक ग्रह. (संबंधित गोष्टीसंबंधित कारक ग्रह) हा तिसरा महत्त्वाचा ग्रह ह्या तीन गोष्टीचा विचार करुन मगच अंतिम निर्णयाला यावे लागते.

  ह्या संबंधात कोणत्या गोष्टीत किती महत्व द्यावयाचे हा खरा कौशल्याचा व शास्त्रातील अनुभवाचा भाग असतो. उदाहरणार्थ सप्तमात मंगळ-शनि पाहिले की कोण्त्याही ज्योतिषाच्या मनांत द्विभार्यायोग होणार असे भाकीत करण्याची इच्छा होईल पण असे काही वर्तवण्यापूर्वी मी सांगत असलेला मंत्र जर तुम्ही लक्षांत ठेवलात तर तुमचे अनुमान फारसे चुकणार नाही.

  एखादी घटना, गोष्ट घडणे म्हणजे जे अंतिम फलीत ते फळासारखे आहे. ग्रहांची स्थानगत स्थिती ही बऱ्याच प्रमाणात बीज रुपने आहे. उदा. सप्तमात मंगळ+राहु ही पेरले म्हणजे त्यापासून फळ येईल असे नसते तर त्याचे झाड होऊन त्याला फुले आली पाहिजेत. तद्‌वत भावेश हा ग्रह फूल-पुष्य आहे. सप्तमांत मंगळ राहू असून बीज स्वरुपात योग असतानाच सप्तमेश समजा षष्टात असेल, सप्तमेश निर्बली, पापग्रहांच्या युतीत, दु:स्थानी असेल तर द्विभार्या किंवा वैधव्य योग पुष्प-स्वरुपातही आहे. अशी परिस्थिती असली तरी जसे फूल आले म्हणजे त्याचे फळ होईलच असे नसते, फूल असले म्हणजे फलधारणा होईलच असे निश्चित नसते तद्‌वत अशा परिस्थितीतही द्विभार्या किंवा वैधव्य योग कदाचित येणारही नाही. अंतिम फळ बघण्याच्या दृष्टीने सप्तमस्थानाचा, वैवाहिक जीवनाचा, पत्नीचा कारक ग्रह शुक्र तो कोणत्या राशीत, स्थानात, किती प्रमाणात बलवान किंवा निर्बल आहे ह्यावर अंतिम निकाल अवलंबून आहे. समजा अशा वेळी शुक्र स्वराशीत, केंद्रात, बलवान. शुभग्रह युक्त असेल तर द्विभार्या योग होणारही नाही. पण शुक्र नीचराशीत, पापग्रह युक्त, निर्बल असेल तर द्विभार्या योग होईल- असे भाकीत करण्यास हरकत नाही.

  कारक ग्रहाला अनन्य साधारण महत्त्व आहे. ह्याचे भान ठेवूनच भविष्य वर्तवावे. एखाद्या गुन्ह्याबद्दल खालच्या कोर्टत, हायकोर्टात, सुप्रीम कोर्टात, फाशीची शिक्षा जरी झाली तरी राष्ट्रपति ती कदाचित ज्याप्रमाणे फिरवू शकतो त्याप्रमाणे कारक ग्रहाला महत्त्व आहे. शुक्र-पत्नि कारक, गुरु-संततिकारक, रवि-पितृकारक, मंगळ-भातृकारक, चंद्र- मातृकारक वगैरे ग्रहांचा अत्यंत सखोल अभ्यास करुन प्राचीन ग्रंथकार कशी आश्चर्यकारक भविष्ये वर्तवीत ह्याचा मी अनुभव घेतला आहे.


श्री व. दा. भट यांच्या “असे ग्रह – अशा राशि” मधून साभार.

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अष्टकूट मिलान

वर-वधू की चंद्र राशी- नक्षत्र पे आधारित गुणधर्म के परस्पर मिलान को अष्टकूट मिलान कहते हैं।

वर्णो वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम्‌ ।

गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिका: ॥

अष्टकूट क्या है ? अष्टकूट सूत्र में वर-वधू के आपसी गुणधर्मों को आठ भागों में बांटा गया है। यह आठ गुण जन्म राशि एवं नक्षत्र पर आधारित हैं। वर-वधू की कुंडली में जन्म समय चंद्र जिस राशि एवं नक्षत्र में रहता है उन्हें व्यक्ति की व्यक्तिगत राशि एवं नक्षत्र माना जाता है। आठ गुणों को क्रमशः १ से ८ अंक दिये गये हैं जो कुल मिला कर ३६ होते हैं। इन ३६ अंकों में से कम से कम १८ अंक मिल जाने पर मिलान को ठीक माना जाता है। कम अंकों में विवाह उचित नहीं मानते हैं। जितने अंक मिलान में मिलते हैं उन्हें अष्टकूट गुण कहते हैं, आम भाषा में गुण मिलान भी कहते हैं।

 अब इन आठ गुणों के बारे में विस्तार से समज लेते है।

१) वर्ण – जन्मकुंडली अनुसार वर-वधू का क्या वर्ण है, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, उसके अनुसार मिलान किया जाता है। जातक का जन्म चाहे किसी भी जाति में हुआ हो लेकिन जन्मकुंडली अनुसार जो जाति बनती है उसी का आपसी मिलान हेाता है क्योंकि मिलान में मानसिक मिलान को प्राथमिकता दी गई है। स्ववर्ण मिलान उत्तम माना गया है।

२) वश्य – वश्य का संबंध व्यक्तित्व से है। वश्य पांच प्रकार के व्यक्तित्व दर्शाता है। चतुष्पाद, कीट, वनचर, द्विपाद और जलचर। जिस प्रकार मछली वन में नहीं रह सकती या कीट किसी वनचर के साथ मेल नहीं कर सकता उसी प्रकार अलग-अलग वश्य के वर-वधू भी आपस में मेल-जोल से नहीं रह सकते।

३) तारा – तारा का संबंध मनुष्य के भाग्य से है। जन्म नक्षत्र से लेकर 27 नक्षत्रों को नौ भागों में बांट कर नौ तारा बनाई गई हैं, जन्म, सम्पत, विपत, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र और अतिमित्र। वर के नक्षत्र से वधू के नक्षत्र तक और वधू के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक तारा गिनने पर विपत, प्रत्यरि और वध नहीं होनी चाहिए, शेष तारा ठीक होती हैं।

४) योनि – योनि का संबंध सीधे सेक्स से है। विभिन्न जीव-जंतुओं के आधार पर तेरह योनियां मानी गयी हैं जैसे अश्व, गज, मेष, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल और सिंह। हर नक्षत्र को एक योनि दी गई है। इसी के अनुसार व्यक्ति का मानसिक स्तर बनता है। विवाह में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण योनि पर निर्भर करता है। शरीर संतुष्टि के लिए योनि मिलान का विशेष महत्व है।

५) राशीश (ग्रहमैत्री) – राशि का संबंध मनुष्य के स्वभाव से है। स्वभाव मनुष्य की राशि पर निर्भर करता है। वर-वधू की जन्मकुंडली में दोनों की परस्पर राशियों के स्वामियों की मित्रता प्रेम भाव को बढ़ाती है और जीवन को सुखमय और तनावरहित बनाती है।

६) गण –  गण का संबंध व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। ग्रह नक्षत्रों के अनुसार गण तीन प्रकार के होते हैं। देव, राक्षस, मनुष्य। देव प्रवृत्ति का मनुष्य सात्विक, धार्मिक होगा, राक्षस प्रवृत्ति का मनुष्य क्रोधी, तामसिक होगा, मनुष्य प्रवृत्ति का मनुष्य मिश्रित प्रवृत्ति का होगा। सामाजिक स्तर में मेल होना आवश्यक है, इससे आपसी प्रेम भाव बढ़ता है।

७) भकूट – भकूट का संबंध जीवन अर्थात आयु से है। विवाह उपरांत वर-वधू की राशि के अनुसार एक दूसरे का संग कितना रहेगा, भकूट निर्णय करता है। वर, वधू की कुंडलियों में राशियों का भौतिक संबंध जीवन को लंबा करता है, इस लिए भकूट आवश्यक माना गया है।

८) नाडी –  नाड़ी का संबंध संतान से है। वर-वधू के शारीरिक संबंधों से उत्पत्ति कैसी होगी, नाड़ी पर निर्भर करती है। शरीर में रक्त प्रवाह और ऊर्जा का विशेष महत्व है जो विवाह उपरांत अधिक आवश्यक है। वर-वधू की ऊर्जा का मिलान नाड़ी से होता है जो तीन प्रकार की मानी गई है। आदि, मध्य, अन्त्य। यदि वर-वधू दोनों की नाड़ी एक ही है तो नाड़ी दोष माना जाता है। क्योंकि समान चुंबकीय ध्रुव एक दूसरे को धकेलते हैं वैसे ही शरीर की आंतरिक समानता गर्भ धारण में उलझन पैदा कर सकती है। इसलिए नाड़ी मिलान अति आवश्यक है।

           अष्टकूट मिलान ही विवाह के लिए काफी नहीं है। फिर भी अष्टकूट मिलान का विशेष महत्व है। अष्टकूट मिलान विवाह उपरांत परस्पर संबंधों को दर्शाता है जो महत्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त कुंडली में मंगली दोष एवं परस्पर अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जानी चाहिए। सप्तम भाव, सप्तमेश, सप्तमभाव में बैठे ग्रह, सप्तम भाव और सप्तमेश को देख रहे ग्रह और सप्तमेश की युति आदि देखना बहुत आवश्यक है।


  • – ज्योतिष जगत व्दारा संकलित.

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साप्ताहिक राशिभविष्य 12 -18 नोव्हेंबर 2017

[ रविवार १२ नोव्हेंबर २०१७ ते शनिवार  १८ नोव्हेंबर २०१७ पर्यंतचे साप्ताहिक राशिभविष्य .

 ग्रहांचा राशीपालट- रवी – १६ नोव्हेंबर रोजी तुला राशीतून वृश्चिक राशीत जात आहे. या आठवड्यात रवी व्यतिरिक्त (चंद्र सोडून ) इतर कोणताही ग्रह राशीपालट करीत नाही आहे.]

 

मेष – व्यावसायिक स्थिति अपेक्षेप्रमाणे राहणार नाही. नौकरीमध्ये अतिरिक्त कामाचे प्रसंग येतील. संततीविषयक प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामात विलंब निर्माण होईल. उष्णतेच्या विकारांपासून काळजी घ्यावी लागेल. प्रवासामधून संमिश्र सफलता लाभेल. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १४, १५, १६, १७.

 

वृषभ – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये समाधानकारक परिणाम मिळतील. संततीच्या आर्थिक प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामास पूर्वार्ध चांगला राहील. मधुमेह असणाऱ्यांनी तब्येतीची काळजी घ्यावी. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १६, १७, १८.

 

मिथुन – व्यावसायिक प्राप्ती चांगली राहील. नौकरीमध्ये उत्तरार्ध समाधानकारक राहील. संततीच्या बाबतीत समाधानकारक परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामासाठी उत्तरार्ध अनुकूल नाही. स्थावराचे संधी चालून येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १२, १३, १८.

 

कर्क – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये संमिश्र परिणाम मिळतील. संततीविषयक प्रश्नांमधून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना संमिश्र सफलता मिळेल. सरकारी कामात दरंगाई निर्माण होईल. भावंडांच्या ओळखीतून लाभ मिळेल. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १४, १५.

 

सिंह –  व्यावसायिक स्थिति चांगली राहील. नौकरीमध्ये ईच्छित कार्यात यश मिळेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे सफलता लाभेल. संततीच्या बाबतीत शुभ परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना सुयश लाभेल. प्रवासामधून कामे सफल होतील. कुटुंबातील अनावश्यक कामावर नियंत्रण ठेवावे. शुभ ता. १२, १३, १६, १७.

 

कन्या –  संततीच्या बाबतीत आर्थिक समस्या उद्भवतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामास उत्तरार्ध चांगला राहील. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये संमिश्र परिणाम मिळतील. महत्वाचे निर्णय तडकाफडकी घेऊ नयेत. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १४, १५.

 

तुला – व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये आर्थिक जबाबदारी वाढेल. संततीच्या बाबतीत शुभ परिणाम मिळतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामात संमिश्र यश मिळेल. अनावशय्क खर्चाचे प्रसंग येतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १२, १३, १६, १७.

वृश्चिक – सरकारी कामासाठी उत्तरार्ध चांगला राहील. व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध तडजोडीचे प्रसंग येतील. संततीच्या कामात दिरंगाई निर्माण होईल. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. मोठ्या भावंडांच्या ओळखीतून लाभ होतील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींचे चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १२, १३, १४, १५.

 

धनु –  नौकरीमध्ये बढती-बदलीचे संकेत मिळतील. व्यावसायिक गुंतवणुकीतून लाभ मिळतील. संततीच्या बाबतीत आनंद देणाऱ्या घटना घडतील. विद्यार्थ्यांना चांगले यश मिळेल. सरकारी कामात सफलता मिळेल. व्यावसायिक धाडसी निर्णयातून लाभ मिळतील. प्रवास कार्यपूर्ती दर्शवितात. मित्र-मंडळींमुळे फायद्याच्या घटना घडतील. शुभ ता. १४, १५, १६, १७.

 

मकर –  संततीच्या आर्थिक समस्या त्रास देतील. विद्यार्थ्यांनी कुसंगतीपासून लांब रहावे. व्यावसायिक स्थिति मनासारखी राहणार नाही. नौकरीमध्ये जबाबदारी वाढेल. आर्थिक मेळ बसविणे कठीण जाईल. सरकारी कामासाठी अनुकूलता राहील. प्रवासामधून कामे यशस्वी होतील. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य लाभेल. शुभ ता. १६, १७, १८.

 

कुंभ –  व्यावसायिक आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये संमिश्र परिणाम मिळतील. संततीच्या शैक्षणिक अडचणीतून मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळेल. सरकारी कामास उत्तरार्ध चांगला राहील. वाहनांच्या वेगावर योग्य नियंत्रण ठेवावे. प्रवासामधून कामे सफलता दर्शवितात. मित्र-मंडळींकडून चांगले सहकार्य मिळेल. शुभ ता. १२, १३, १८.

 

मीन – उद्योग-व्यवसायात आवक चांगली राहील. नौकरीमध्ये मनाविरुद्ध घटना घडतील. संततीच्या अडचणीतून योग्य मार्ग निघतील. विद्यार्थ्यांना मनाप्रमाणे यश मिळणार नाही. सरकारी कामात अडचणी येतील. जोडीदाराच्या वागण्यामुळे मनस्ताप होतील. तब्येतीकडे दुर्लक्ष करु नये. प्रवासामधून नियोजित कामे यशस्वी होतील. शुभ ता. १२, १३, १४, १५.


सौजन्य – दाते पंचांग

बालारिष्ट -एक अभ्यास

     नराणां कुंजराणांच विंशोत्तरशतं विदु: ॥

 

यात मनुष्याचे पूर्ण आयुष्य १२० वर्षे सांगितले आहे. यापेक्षा जास्त आयुष्याल दिव्यायु असे शास्त्राकार म्हणतात. हे आयुष्य योगाभ्यास, मंत्रसामर्थ्य व दिव्यौषधि यांच्या योगाने प्राप्त होते.

 

        अष्टौ बालारिष्टमादौ नरांणां योगारिष्टं प्राहुराविंशति: स्यात्‌ ॥

      अल्पं चाद्वाविंशतो मध्यमायुरासप्तत्या: पूर्णमायु: शतान्तम्‌ ॥

 

           आठ वर्षेपर्यंत बालारिष्ट, २० वर्षेंपर्यंत योगारिष्ट, ३२ वर्षापर्यंत अल्पायु, ७० वर्षापर्यंत मध्यायु व १०० वर्षापर्यंत पूर्णायु असे आयुष्याचे विभाग केलेले आहेत.

          यात मनुष्याचे आयुष्य शंभर वर्षेच कल्पिलेले आहे. परंतु यापेक्षा जास्त जगलेले क्वचित आढळतात. म्हणून पूर्णायु १२० व दीर्घायु १०० वर्षे असे भाग करावे असे वाटते.

          दशाप्रकारात अष्टोत्तरीवरुन १०८ वर्षे पूर्ण आयुष्य मानलेले दिसते. म्हणून “दशा विंशोत्तरी ग्राह्या” म्हणजे विशोत्तरी दशा ग्राह्य आहे असे म्हटलले आहे. विंशोत्तरीत १२० वर्षे पूर्णायुत्व मानलेले दिसते.

     यातील पहिला विभाग ८ वर्षाचा असून त्याला ” बालारिष्ट ” असे नांव दिलेले आहे.

 

       आद्ये चतुष्के जननीकृताद्यैर्मध्ये तु पित्रार्जित पापसंघै ॥

     बालस्तदन्त्यासु चतु शरस्तु स्वकीयदौषै: समुपैति नाशम्‌ ॥

 

पहिल्या चार वर्षात आईच्या कर्मांनी, दुसऱ्या चार वर्षात बापाच्या कर्मांनी व शेवटच्या चार वर्षात स्वत:च्या कर्मांनी बालक मरण पावते असे सांगितलेले आहे. म्हणजे हा विभाग १२ वर्षात आहे असे ठरते.

 

   अद्वादशाब्दान्तरयोनिजन्मनामायु: कला निश्चयितुं न शक्यते ॥

 

   बारा वर्षे पर्यंत मुलांच्या ग्रहांवरुन त्यांचे आयुष्य समजणे शक्य नाही असे प्राचीन ज्योतिर्विद म्हणतात.

 

   मात्राच पित्रा कृतपापकर्मणा बालग्नहैनोशमुपैति बालक: ॥

 

             आईबापांच्या पापकर्मानी मुलांचे ग्रह त्यांना मारक होतात. ही मर्यादा ८ वर्षांची आहे व त्यात पहिली चार आईच्या दोषांनी व दुसरी चार बापाच्या दोषांनी मारक होतात असे याचे तात्पर्य आहे.

            पापकर्म म्हणजे कुपथ्य, दुराचरण व हयगय (दुर्लक्ष) किंवा पूर्वजन्मीची दृष्कृत्ये. लहानपणी ४ वर्षेपर्यंत मुलांच्या संगोपनाचे काम मुख्यत्वे आईकडेच असते. पुढे व बारा वर्षेपर्यंत मुले स्वछंदाने वागू लागतात. आईबापांची नजर चुकवून वाटेल ते खातात व भटकतात. त्यांना त्या स्वत:ला कसे जपावे याचे ज्ञान असते. त्यामुळे त्यांना भयंकर रोग किंवा अपघात होऊन मरण येते. म्हणून १२ वर्षे मुलांच्या आयुष्याचा विर्णय करीता येत नाही असे ज्योतिर्विदांनी ठरवले.

        प्रयत्नवादाच्या दृष्टीने हे म्हणणे बरोबर आहे. पंरतु ज्योतिषशास्त्राला हे पटत नाही. मरण मग ते केव्हांही असो ते ज्योति:षशास्त्राने समजलेच पाहिजे एक, किंवा ते शास्त्रमर्यादेच्या बाहेरचे तरी असले पाहिजे. माझ्या मते ते शास्त्रमर्यादेच्या बाहेरचे आहे. ज्योतिष:शास्त्राने मरणप्राय स्थिती समजेल परंतु तो त्या वेळी  मरेलच असे निश्चयात्मक समजत नही. ज्योति:षशास्त्राच्या फाजील अभिमानाने कोणी काहीही म्हणोत. प्राचीन ज्योतिर्विदांनी १२ वर्षेपर्यत आयुष्याचा निश्चय होत नाही म्हणून म्हटले ते बरोबर आहे. पण त्याला जे कारण सांगितले ते मात्र शास्त्राला धरुन नही. ती केवळ उडवा उडवी आहे.

   मृत्यूचा निश्चय करणे अशक्य नसले तरी ते दुर्बोध आहे याबद्दल शंकाच नाही. आयुष्याचे जे विभाग केलेले आहेत त्यांचेही ज्ञान जेथे दुर्ज्ञेय तेथे मृत्युचे वर्ष कसे समजूं शकेल? तथापि सर्व बाजूंनी पूर्ण विचार केला तर क्वचित मृत्युकाल समजणे शक्य आहे. याचे दोन मार्ग आहेत. नातलगांच्या कुंडल्यांवरुन एखाद्याच्या मृत्युकालाचे किंचित अनुमान करता येते. ते अनुमान व जन्ममणाराची अनिष्ट ग्रहस्थिति यांचा मेळ घेतल्यास मृत्यु निश्चित होऊ शकेल. पण हेही काम काही सुलभ नाही. यासाठी मृत्यु सांगण्याच्या भानगडीत कोणी पडू नये हेच उत्तम. ज्योतिष्याने पाहिजे तर आपल्या समाधानासाठी अनुमान करुन ठेवावे व ते कसे काय जुळते ते पहावे. पण मृत्यु कोणालाही सागूं नये.

     किमान दोन बाबींचा विचार केल्याशिवाय शास्त्रज्ञ ज्योतिष्याने मुलाच्या आयुष्याचा विचार करु नये. कारण आईबापांना जर मुले जगण्याचा योग नसेल तर मुलाच्या कुंडलीतला एखाद्या साधा अनिष्ट योगसुद्धा मारक होतो. परंतु आईबापांचा संततीयोग चांगला असेल तर मुलाला मारकयोग बलवत्तर असूनही ते मूल मरणार नाही. भयंकर आजारी मात्र होऊ शकेल.

      कित्येक मुलांना ज्येष्ठ भावंडाला मारकयोग असतो, तर कित्येकांना पाठीवरील भावंड न जगण्याचा योग असतो. कित्येकांना ज्येष्ठ व कनिष्ठ या दोघांनाही मारकयोग असतो, म्हणून आईबापांच्या संततीयोगांवरून जे ज्ञान होते त्यापेक्षा भावंडांच्या भ्रातृयोगावरून अधिक स्पष्ट होते. यासाठी भावंडांचे भ्रातृयोगही विचारात घ्यावे.

 

       यासाठी खालील नियमांनी त्याच्या आयुष्याची कल्पना करावी.

    १. आईबापाना (विशेषत: आईला) मुले जगण्याचे योग कशा प्रकारचे आहेत.

    २. गर्भकाली किंवा प्रसूतिकाली त्यांचे संततीस्थान कसे आहे.

    ३. झालेल्या बालकाचे तारकमारक योग कसे आहेत.

    ४. पूर्वीच्या बालकाला पाठीवरील भाऊबहिणींचा कसा योग आहे.

                जो ज्योतिषी या मुद्यांचा विचार न करता केवळ मुलाच्या ग्रहयोगावरून निर्णय देतो तो एक तर दिव्यज्ञानी असला पाहीजे किंवा कुडबुड्यांच्या पंक्तीतला तरी असला पाहीजे. कायदा, पुरावा व आत्मसंवेदना यांच्या सारसार विचाराने जो जज्मेंट देतो तो जसा उत्तम न्यायाधिश समजला जातो तसाच जो ज्योतिषी शास्त्राचे नियम, पुरावा व स्वयंस्फूर्ति यांच्या सारासार विचाराने निर्णय घेतो त्यालाच शास्त्रज्ञ ज्योतिषी म्हणता येईल.

               इतक्या गोष्टीचा पूर्ण विचार करुन झालेले मूल लाभेल किंवा नाही ते ठरवावे. नंतर लाभणार नाही असे ठरले तर त्या मुलाला व आईबाप व भावंडे यांना अनिष्ट ग्रहयोग केंव्हा येतात ते पाहून मृत्यूचा काल ठरवावा. हे काम ज्योतिष्याने आपल्या समाधानासाठीच केवळ करावे. पुष्कळ अनुभव घ्यावा. त्याची टिपणे करावी व अशा रीतीने अभ्यास करुन खात्री झाली की आपणास मृत्यु समजतो, तरच दुसऱ्याला सांगावे व तेहि जिज्ञासु असेल त्याला, वाटेल त्याला सांगु नये.


*श्री विष्णू गोपाळ नवाथे यांच्या “सुलभ जातक” मधून साभार .

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