1 Jyotish Jagat E-Magazine Jan. 2018

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राजयोग के सामुद्रिकलक्षण

 

 भारतीय सामुद्रिक शास्त्र उतना ही पुराना है जीतनी मानव सभ्यता है। इस शाखा के भी आद्य प्रवर्तक महर्षि पराशर व समुद्र ऋषि माने जाते है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निजी विशेषताओं की मात्रा आधी तथा शेष अंश पैतृक गुण व् वातावरण कृत गुण हावी रहते है।

 

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ।

पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिन: ॥

 

आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पाँच गर्भ में ही प्राणियों को विधाता रच देते है।

 

निचे कुछ नियम बताए जा रहे है जो सामुद्रिक शास्त्र में राजयोग कारक माने जाते है। यँहा राजयोग का अर्थ धनी एवं पारिवारिक सुख संपन्न युक्त समजना चाहिए। 

 

           जिसके जन्मांग में प्रबल रजयोग होता है, उसके हाथ अथवा पैर में अवश्य राजचिन्ह होता है।

[*हाथ और पैर से यहॉ हाथ और पैर का तलुआ ग्रहण करना चाहिए ।]

                अनामिका के मूल में स्थित सीधी ऊर्ध्वाध: रेखा पुण्यप्रदा होती है । मध्यमा अंगुली से प्रारंभ होकर मणिबन्ध तक विस्तीर्ण ऊर्ध्व रेखा विशेष रुप से राजसुखकारक होती है ।

                      करतल में खण्डित रेखाएँ (अन्य किसी रेखा से कटने वाली रेखा) नेष्ट फल देती है तथा जो रेखा क्षीण होती है, वह मध्यम फल देती है।

                      जिस पुरुष के अंगुष्ठ के मध्य भाग में स्पष्ट सुन्दर यवचिन्ह हो, वह यशस्वी, अपने कुल में श्रेष्ठ, आभूषण, धन-ऐश्वर्य और युवती-स्त्री से सम्पन्न होता है।

                    जिसके दक्षिण करतल में मत्स्य, छत्र और, सरोवर, अंकुश और वीणा के चिन्ह हो, वह राजा होता है।

                      जिसके करतल में मुशल, पर्वत, कृपाण और हल के चिन्ह अंकित हो, वह धनाढ्य होता है । यदि करतल में पुष्पमाला के चिन्ह हों, तब वैसा ही फल होता है । यदि राजपुत्र की हथेली में ये चिन्ह हों, तो वह राजा होता है है।

                     जिसके हाथ में दण्ड के सहित छत्र हो अथवा ध्वजा या चामर रेखा हो तो मनुष्य चक्रवर्ती राजा होता है।  जिसके हाथ और पैर के तलभाग में अश्व, कलम, धनुष, वक्र, ध्वजा, सिंहासन या पालकी के समान चिन्ह हों उसके गृह में महालक्ष्मी सदा निवास करती है।

                   कुम्भ (घडा), स्तम्भ, अश्व, मृदंग, छडी अथवा वृक्ष के चिन्ह हों, वह पण्डित या मद्यविक्रेता होता है।

                  विशाल मस्तक, कमल की पंखुडी के समान नेत्र, सुन्दर वृत्ताकार ललाट- इन चिन्हों से युक्त व्यक्ति भूमण्डल का स्वामी होता है । खडे रहते जिसके हथ घुटने का स्पर्श करें, वह महान राजा होता है।

                जिसकी नाभि गहरी और नासिका सीधी हो, रत्नशिला के समान सुचिक्कण और समतल वक्षस्थल हों तथा पैर कोमल और रक्ताभ हो तो वह श्रेष्ठ राजा होता है।

               हाथ की हथेली में विद्यमान तिल अतुल धन देने वाला होता है । वही तिल यदि पादतल में हो तो वाहनादि सुख का कारक होता है।

              राजवंश में उत्पन्न जातक में यदि उक्त चिन्ह उपस्थित हों, तो पूर्ण फल देते है । अन्य कुलोत्पन्न जातक के अंगों में यदि उक्त चिन्ह हों तो वह राजा के समान ही धनपति होता है।

 

इसे भी पढ़े –       हस्त रेखा अध्ययन के सामान्य सिद्धांत

हस्त रेखा परिचय

 


   – ज्योतिष जगत द्वारा संकलित.

 

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हस्त रेखा अध्ययन के सामान्य सिद्धांत

 हस्त रेखाओं के प्रकार के बारे में पिछले लेख (हस्त रेखा परिचय) में हमने जाना। अब रेखाओं का अध्ययन करने के बारे में बताते है। हस्त रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए। रेखाओं का अध्ययन करने  से पूर्व रेखा के बारे में जानकारी कुछ विशेष जानकारी कर लेनी उचित होगा। हस्त रेखाओं अध्ययन के कुछ सामान्य किन्तु मौलिक सिद्धांत पाठक गण जान ले।  रेखाओं की जानकारी के साथ ही निम्न प्रकार की जानकारी पाठकों के लिए आवश्यक होती है।

  • रेखाए स्पष्ट सुन्दर लालिमा लिये हुए तथा साफ – सुथरी होनी चाहिए। इनके मार्ग में न तो किसी प्रकार का चिन्ह  होना चाहिए और न किसी प्रकार का द्वीप होना चाहिए।
  • रक्तिम रेखाए व्यक्ति की  प्रसन्नता और स्वस्थ मनोवृत्ति को दर्शाती है। किंचित पीलापन  लिए हुयी रेखाए स्वास्थ्य में कमी तथा निराशावादी मानसिकता दर्शाती है। कालापन लिए हुयी रेखाए निराशा तथा कमजोरी सूचित करती है। 
  • अगर किसी रेखा के साथ-साथ कोई और रेखा चले तो उस रेखा को शक्ति मिलती है। अतः उस रेखा का विशेष प्रभाव समझना चाहिए।
  • कमजोर, दुर्बल अथवा मुर्झाई हुई रेखाएं बाधाओं की सूचक होती हैं। टूटी हुई रेखाएं अशुभ फल प्रदान करती हैं। 
  • अस्पष्ट और क्षीण रेखाएं बाधाओं की पूर्व सूचना देती हैं। ऐसी रेखाएं मन के अस्थिर होने तथा परेशानी का संकेत देती हैं।
  • अगर कोई रेखा अपने आखरी सिरे पर जाकर कई भागों में बंट जाए तो उसका फल भी बदल जाता है। ऐसी रेखा को प्रतिकूल फलदायी समझा जाता है।
  • अगर किसी रेखा में से कोई रेखा निकलकर ऊपर की ओर बढ़े तो उस रेखा के फल में वृद्धि होती है। 
  • अगर कोई रेखा निर्बल, कमजोर तथा अधिक सूक्ष्म हो तो ऐसी रेखा का प्रभाव गौण होता है अथवा यह प्रभावहीन होती है।
  • यदि किसी रेखा के मार्ग में वर्ग हो तो इससे उस रेखा को बल मिलता है और वह शुभ फल प्रदान करती है।
  • अगर किसी रेखा के ऊपर त्रिकोण का निशान हो तो उस रेखा से संबंधित कार्य शीघ्र होने की संभावना रहती है। स रेखाओं पर तारा कार्य में शीघ्र सफलता का सूचक होता है।
  • रेखाओं पर तिरछी रेखाएं हानिकारक होती हैं।
  • पतली रेखाएं श्रेष्ठ फल देने में सक्षम होती हैं। वहीं मोटी रेखाएं व्यक्ति की दुर्बलता का संकेत देती हैं।
  • अगर कोई रेखा गहरी हो, चलते-चलते बीच में रुक जाए, अस्पष्ट हो तो दुर्घटना का संकेत देती है।
  • ढलवां रेखाएं व्यक्ति के परिश्रम को तो स्पष्ट करती हैं परंतु उसके फल का संकेत नहीं देतीं। ऐसी रेखाओं से शुभ फल मिलने में संदेह रहता है।
  • अगर किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर जाए या नीचे की ओर झुके तो उसका फल प्रतिकूल होता है या कमी आती है। इसके विपरीत ऐसी कोई रेखा ऊपर की ओर जाए तो फल में वृद्धि होती है।
  • जंजीरनुमा रेखा अशुभ फल देती है।
  • यदि विवाह रेखा, जो बुध पर्वत पर होती है, जंजीरनुमा हो तो प्रेम प्यार में असफलता का मुंह देखना पड़ता है।
  • यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरनुमा हो तो व्यक्ति अस्थिर बुद्धि वाला अथवा पागल हो सकता है।
  • लहरदार रेखा अशुभ मानी गई है। ऐसी रेखाएं शुभ फल प्रदान नहीं करती हैं।
  • रेखा अगर कहीं पतली और कहीं मोटी हो तो रेखा अशुभ होती है। ऐसी रेखा वाला व्यक्ति बार-बार धोखा खाता है तथा सफलता-असफलता के बीच झूलता रहता है।
  • यदि प्रणय रेखा से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर जाए तो प्रेम में सफलता और सुंदर पति अथवा पत्नी की प्राप्ति होती है। परंतु यदि नीचे की ओर रुख करे तो प्रेम में असफलता मिलती तथा पति अथवा पत्नी को अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है।

 

 

     इसे भी पढ़े –             राजयोग के सामुद्रिक लक्षण

हस्त रेखा परिचय


– ज्योतिष जगत द्वारा संकलित.

 

 

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हस्त रेखा परिचय

         हस्त सामुद्रिक शास्त्र को सीधे तरीके से दो भाग में बात सकते है। १) हस्ता लक्षण शास्त्र और २) हस्त रेखा शास्त्र। हस्त लक्षण शास्त्र में हाथ की बनावट, रंग, आकार, स्पर्श अदि के माध्यम से व्यक्तिका स्वभाव जाना जा सकता है तो हस्त रेखा शास्त्र में रेखाओंके मध्यमा से भविष्य में होनेवाली घटना क्रम को जानने की कोशिस की जाती है। आज हम देखेंगे हस्त रेखाओंके बारे में।

       हाथ पर सात (७) प्रमुख रेखाएं और पांच (५) गौण रेखाएं होती हैं। प्रमुख रेखाए  इस प्रकार है।

१) जीवन रेखा :-

इस रेखा को आयु रेखा भी कहते हैं। यह बृहस्पति पर्वत के ठीक नीचे से चलती है और शुक्र पर्वत को घेरती हुई नीचे की ओर बढ़ती है।  इस रेखा के विश्लेषण से आयु काल, बीमारी, मृत्यु आदि के बारे में जाना जा सकता है। यह रेखा लंबी, संकरी, गहरी और अनियमितताओं से रहित हो, और टूटी हुई न हो और इस पर कोई चिह्न न हो तो शुभ होती है। शुभ जीवन रेखा व्यक्ति के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं स्फुर्ति की सूचक होती है।

२) मस्तिष्क रेखा :-

मस्तिष्क रेखा तीन विभिन्न स्थानों से आरंभ हो सकती है- 1. गुरु पर्वत के केंद्र से 2. जीवन रेखा के आरंभ से 3. जीवन रेखा के भीतर मंगल क्षेत्र से इस रेखा के विश्लेषण से व्यक्ति की प्रतिभा, ऊर्जा, लक्ष्य, दृढ़ता, तर्कक्षमता आदि के बारे में जाना जाता है।

३) हृदय रेखा :-

हृदय रेखा बृहस्पति क्षेत्र से आरंभ होकर सूर्य पर्वत को पार करती हुई बुध पर्वत के मूल तक जाती है। इस रेखा से भावुकता, प्रेम संबंध, मन की स्थिति आदि का विचार किया जाता है।

४)स्वास्थ्य रेखा :-

स्वास्थ्य रेखा बुध पर्वत क्षेत्र से आरंभ होकर नीचे की ओर जाती है। इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य, बीमारी, असाध्य रोगों आदि का विचार किया जाता है।

५) सूर्य रेखा :-

सूर्य रेखा का आरंभ जीवन रेखा, चंद्र पर्वत क्षेत्र, मंगल पर्वत क्षेत्र, मस्तिष्क रेखा अथवा हृदय रेखा कहीं से भी हो सकता है। इसे प्रतिभा रेखा अथवा सफलता रेखा भी कहा जाता है।

६) भाग्य रेखा :- 

भाग्य रेखा जीवन रेखा, मणिबंध, चंद्र पर्वत, मस्तिष्क रेखा या फिर हृदय रेखा से आरंभ होकर मध्यमा के पर्वत तक जाती है। भाग्य रेखा के विश्लेषण से कार्य व्यवसाय, कूटनीति, लोकप्रियता आदि का विचार किया जाता है।

७) विवाह रेखा :-

विवाह रेखा कनिष्ठिका अंगुली के नीचे और ह्रदय रेखा के उपरसे बुध पर्वत पे चलती है। विवाह रेखा के विश्लेषण से विवाह ,प्रेमसंबंध, वैवाहिक जीवन तथा जीवन साथी के विषय में विचार किया जाता है।

 

गौण रेखाएं : हाथ में निम्नलिखित पांच गौण रेखाएं पाई जाती हैं। गौण रेखाए कोनसी है इसमें काफी मतभेद पाए जाते है। ज्यादातर विशेतज्ञ नीचे दी गयी रेखाओंको प्रमुख गौण रेखाए मानते है।  

१) मंगल रेखा :-

यह मंगल पर्वत से प्रारंभ होकर जीवन रेखा की ओर जाती है। इससे शौर्य, आत्मविश्वास, क्रोध आदि का विश्लेषण किया जाता है।

२) वासना रेखा :-

यह स्वास्थ्य रेखा के समानांतर होती है। इस रेखा से स्त्री अथवा पुरुष की काम भावना का विश्लेषण किया जाता है।

३) अंतरज्ञान रेखा :-

यह बुध पर्वत क्षेत्र से आरंभ होकर चंद्र पर्वत क्षेत्र की ओर जाती है। यह अर्द्धवृत्ताकार होती है। इससे पुरुष अथवा स्त्री के आंतरिक व्यक्तित्व भौतिकता, धर्म, ऋद्धि-सिद्धि आदि के बारे में विचार किया जाता है।

 ४) शुक्र कंकण (मेखला) :-

तर्जनी और मध्यमा के बिच में से शुरू होकर अमानिका और कनिष्ठिका के बिच में समाप्त होती है। (शनि और रवि पर्वत को घेरे हुए रहने वाली रेखा ) इस रेखा से कामवासना, कलाप्रियता, सौंदर्यप्रियता के बारे में विचार किया जाता है। 

५) मणिबंध रेखाएं :-

ये कलाई में पाई जाती हैं। इन रेखाओं को अन्य रेखाओं के साथ विश्लेषण कर उन्नति, भाग्यवृद्धि, विदेश यात्रा आदि का विचार किया जाता है।


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इसे भी पढ़े हस्त रेखा अध्ययन के सामान्य सिद्धांत  

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